मैं हूँ बेटी इस समाज की, सुन लो सब मेरी पुकार,
जब हो गई मेरी शादी, बदल गया मेरा घर-संज़ार.
याद करती हूँ मैं बैठकर, अपना वो पिछला जीवन,
नम हो जाती हैं मेरी आँखें, अब वो प्यार कहाँ इस आँगन.
गुड़िया-गुड्डों के संग बीता, भोला वो बचपन मेरा,
'लाडो-रानी' कहकर हर पल, आँगन में होता था सवेरा.
पापा, चाचा, दादी भैया, सबने लाड-प्यार से पाला, मेरी हर एक छोटी खुशी ने, घर में था उजाला डाला.
माँ हर पल मुझसे कहती थी, एक दिन राजकुमार आएगा, मेरी रानी गुड़िया को, वह अपने साथ ले जाएगा.
हर ज़िद पर पापा मेरे, खुशियों की बारिश करते थे,
"जहाँ रहे खुशहाल रहे", बस यही दुआ वो करते थे.
सबकी बातें सुनकर मैंने माना, आगे है ख़ुशियों का संसार.
ससुराल में भी माँ होगी, और मिलेगा पिता जैसा प्यार.
सोचा था जब साथ होगा पिया का, भूल जाऊँगी पीहर का आँगन,
अब बढ़ी मैं इस नव-जीवन पथ पर, करने को नया समर्पण.
ज्यों ही बीते कुछ पल वहाँ, दिखा उनका वास्तविक परिवार,
शुरू हुए तानों के सिलसिले, और खुशियाँ बनीं हाहाकार.
मिला आदर हमें बहुत कम, हर बात पर ताने कसने लगे,
मासूम अरमानों को कुचलकर, वो अब दहेज की माँग करने लगे.
मिले दहेज में फ्रिज, कूलर, एसी, गाड़ी और सामानों में खोट निकालते हैं,
सुख-सुविधा के हर साधन को, वो सस्ता और कम बतलाते हैं.
शान के सारे ज़ेवर भी उन्हें अब नकली लगते हैं,
सबमें ही कुछ कमी है कहकर, वो लालच के बीज बोते हैं.
"मिला हमें शादी में क्या?" बस यही बात सुनाई देती है,
मैं बेटी हूँ इस समाज की, जिसे हर घड़ी दुहाई देती है.
दहेज ही क्या मेरे जीवन का आधार है? या दहेज के कारण ही, आज बेटी समाज पर भार है?
दहेज के लोभी बनकर सब, मर्यादा की सीमा रेखा लाँघ गए,
कौरवों के समान वो अपने, सारे धर्म और रिश्ते भूल गए.
रचे उन्होंने सभी षड्यंत्र, मुझे हर पल तड़पाने के,
पर कृष्णा की लीला अति न्यारी, रास्ते ढूँढ़ लिए बचाने के.
जैसे उन्होंने बढ़ाई थी लाज द्रौपदी की भरे दरबार में,
वैसे ही मेरे जीवन की नौका, प्रभु ने पार लगाई इस संसार में.
चौरखट पर आकर जीवन की, मैं फिर से आज जिंदा बच गई,
प्रभु ने थाम लिया मेरा हाथ, और मेरी नई तकदीर रच गई.
मैं पूछती हूँ इस समाज से, क्यों हर बार बहू ही आग में जलती हैं?
क्यों न कभी कोई सास, माँ, बेटी के साथ ये व्यवहार हुआ?
सब अत्याचारों ने, मुझको पागल तक बना दिया,
पर सहते-सहते अब मैं, खुद को पत्थर सा मजबूत बना लिया.
अब शक्ति नहीं बस सहने की, अब तो ये कुप्रथा बंद करो,
हर बहू भी एक बेटी है, अपनी बेटी समझकर उस पर रहम करो.
अब हो गई हूँ मैं तैयार, पथ पर अपने लड़ सकती हूँ,
खुद की लड़ाई खुद ही लड़कर, आगे मैं बढ़ सकती हूँ.
अब दो नारी को भी गौरव, बने वो स्तंभ समाज की,
प्रगति का आधार बने वो, शान बने आने वाले आज की.
हो नारी सशक्त अब, जो है हर परिवार का आधार,
आज की बेटी, कल की बहु, फिर सास बनती है स्वीकार.
थोड़ा समझकर देखो समाज, बहू से ही तो घर की आस है,
बहु से ही बेटी जन्मती है, और बेटों का इतिहास है