रेल के एक छोटे से सफ़र में,
एक लड़की मेरे पास बैठी हुई थी।
न मैंने उनका नाम पूछा, न उन्होंने मेरा ।
दोनों लोग बाहर देख रहे थे,
खिड़की के बाहर भागते पेड़-पौधे, नदियाँ,
और भीतर चुप्पी का शोर था।
दोनों लोग कहीं खोए हुए थे,
उसने अचानक पूछा-"आप भी किसी से दूर जा रहे हैं?"
मैंने हँसकर कहा, "शायद खुद से।"
वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली-"तो जल्दी मत जाना, कभी-कभी खुद तक पहुँचने में पूरी ज़िंदगी लग जाती हैं।
अगला स्टेशन आया, वह उतर गयी। न नाम बताया, न फिर कभी मिलना हुआ।
आज भी जब सफ़र लंबा होता है, मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ-शायद किसी अगले स्टेशन पर वह अनजाना सा दोस्त फिर मिले, और पूछे-"अब खुद से मिले?"