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चेहरे और समय

Adv DK Kanojiya

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                            लोग बदले हैं कि मौसम का असर है, क्या कहें,
        
                                                    
                            
हर तरफ़ चेहरों का बदला-सा सफ़र है, क्या कहें।

कल तलक जो हाथ थामे साथ चलने की क़सम थे,
आज उनके हाथ में अपना ही घर है, क्या कहें।

सच की बातें करने वाले भी बड़े मशहूर थे,
अब उन्हीं के होंठ पर चुप्पी का डर है, क्या कहें।

जो हमें अपना समझकर हर घड़ी शामिल रहे,
अब हमारी ज़िंदगी में हम ही बेघर हैं, क्या कहें।

वक़्त ने जब आईना उनके सामने रख दिया,
देखकर चेहरा सभी कहते-“ये किधर है?”, क्या कहें।

दोष देना भी भला किसको यहाँ आसान है,
आदमी कम, आदमी में स्वार्थ ज़्यादा है, क्या कहें।

रिश्ते अब एहसान जैसे, प्रेम भी सौदा हुआ,
दिल बचाना भी यहाँ कोई हुनर है, क्या कहें।

हमने जिनको देवता समझा, वही बाज़ार में
अपनी कीमत देखकर ख़ुश हैं, ये हुनर है, क्या कहें।

अब किसी के बदलने का शिकवा नहीं करते हम,
समय ने बस खोल दी आँखें ख़बर है, क्या कहें।

चेहरे वही हैं, मगर पहचान बदली है बहुत,
आदमी के भीतर आदमी कितना मर गया क्या कहें।
-डी के कनौजिया
एक महीने पहले
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