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पहलगाम की चीख़

Adv. Anit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहलगाम की वादियों में छाई थी उदासी,
        
                                                    
                            
आतंक के साये में, मानवता थी प्यासी।
बर्फीली हवाओं में घुली थी बारूद की गंध,
कायरों ने खेला था, मौत का नंगा नाच नींद।

निर्दोषों की चीख़ से थर्राया आसमान,
खून से सनी धरती, और बेबस इंसान।
मासूम बच्चे, महिलाएं, बूढ़े और जवान,
आतंक की भेंट चढ़े, खोकर अपनी जान।

पीठ पीछे वार किया, कायरों ने छुपकर,
शांति की उम्मीदों पर फेरा पानी जमकर।
पाक के हुक्मरान, करते रहे इनकार,
मगर उनकी करतूतों से, लज्जित था संसार।

युद्धविराम की धज्जियां उड़ाते रहे वो,
गोलीबारी से लहू बहाते रहे वो।
हर बार झूठ का पर्दा ओढ़ते रहे वो,
इंसानियत को हर बार मारते रहे वो।

भारत ने ललकारा, दुश्मन को करारा,
जवानों ने दिखाया, अद्भुत नज़ारा।
बहादुरी की मिसाल, खून में लिख दी,
दुश्मनों के मंसूबों की, जड़ें हिला दीं।

हर गोली का जवाब, गोले से दिया,
आतंक के आकाओं को, संदेश दिया।
यह भारत है, वीरों की धरती महान,
अमन की चाहत है, पर झुकेंगे नहीं हम।

पहलगाम की चीख़, बेकार न जाएगी,
हर शहीद की कुर्बानी, रंग लाएगी।
आतंक का खात्मा, अब होकर रहेगा,
भारत मां का आँचल, सुरक्षित रहेगा।
एक वर्ष पहले
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