जब उम्र बेइंतहा मदहोश खिलखिलाने की थी
बिना दस्तक दिए शिकस्त कर गया उन्हें ज़माना ,
वह नूर जो कभी चंद मिनटों में रूह जगमगा जाता था
आज मायूस खामोश किसी कोने में बैठा है
बनके कभी गरीबी तो कभी लाचारी का बहाना.
कीमत लगाए खड़े हैं अनेक लड़कपन के व्यापारी ,
वह मोहब्बत खोजती आंखों से देख पूछते
हर लम्हा हर वक्त कि हम हैं आखिर किसकी जिम्मेदारी .
उम्र से पहले जो हो गए सयाने
ना किताब न खिलौने ना कोई रिश्ते जो निभाने,
ये साज़िश है या रिवायत खुदा जाने ! खुदा जाने !!
बेवजह इलज़ाम ,झूठे रोटी के टुकड़े पर जान कुर्बान ,
दर्द बयां करते जिस्म पर वह अनेक निशान ,
हर वक्त खोजते उस सहारे को , रोशनी जो भर दे उस किनारे को ,
जो बिना किसी किराए के कर दे ,, उनके आशियाने को प्यार भरा मकान,
बस इतना सा कर दे कोई जिंदगी पर एहसान!!
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