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दर्द से आशा तक

Aditi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्दों की ये सीमा पार होने को है....
        
                                                    
                            
आसमा भी दुख के मारे रोने को है।
यू खुद को टूटने से रोको तुम....
इंतजार के दावानल में ख़ुद को झोंको तुम ।
एक दिन ..... जरूर ये इंतजार काम आयेगा
उस दिन ये अंधकार दूर हो जाएगा...
और फिर कामयाबी का सुरज आसमान में खिलखिलाएगा।

वक़्त हो गया है, इस काली रात के जाने का...
आसमा भी तिलमिला रहा है उस क्षैतिज के आने का ।
कब तक शौक मनाओगे अपने टूटे घर के साजों का....
कब तक बोझ उठाओगे इन कानों पर उन आवाजों का ।
थोड़ा और इंतज़ार करो , सहमों नहीं विश्वाश करो...
उजाला फ़िर से आयेगा....टूटा घर फ़िर झिलमिलायेग़ा ।

कब तक मन का कोना निर्जन रहेगा...
या यूहीं धुंध का बसेरा होगा।
वो घी का दिया भी लोह खोने को है....
वो सब्र का बांध भी खंडित होने को है।
बात तो करनी है उसे, बात करे कौन....
दर्द से दो - दो हाथ कौन करे।
हे! कलयुग के अभिमन्यु.....
उठो..... साहस करो ....
इस चक्रव्युह को तोड़ो तुम
अपने खंडित मन के चिथडो़ को जोड़ों तुम ।
थोड़ा और इंतज़ार करो..... साहमो नहीं विश्वाश करो....
उजाला फ़िर से आयेगा...... और बुझता दीया अमर हो जाएगा।

जीवन की इस बेला में मानुष उतार चढ़ाव का मारा है....
डूबती नैया को तो तिनके का भी सहारा है ।
अंधेरे से उजाले तक का सफ़र आसान न हो पाएगा
मगर लड़ाका डटा रहा तो मुमकिन ये कर पाएगा।
साहस रखो........ अडिग बनो , इस भंवर से पतवार को मोड़ो तुम......
अपने निर्जन मन के धागों को आहिस्ता से जोड़ों तुम।
थोड़ा और इंतज़ार करो..... सहमों नहीं विश्वाश करो....
उजाला फ़िर से आयेगा..... और मानुष भवसागर तर जायेगा।




 
2 घंटे पहले
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Chandra prakash

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