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रण का साहित्य

Abhishek Leela

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            विविध हैं मेरे मोल अरे
        
                                                    
                            
तू क्यूँ इतना घबराता है
मैं साहित्य रचता हूँ रण का
तू प्रेमगीत बस गाता है

जो प्रेम नहीं सम्मोहन में
जो प्रेम नहीं बाहुबलियों में
उस प्रेम न्योछावर पंक्तियों का
विजयरथ मैं रोज़ चलाता हू

तू रोता है चिल्लाता है
फिर आँख बंद सो जाता है
मैं मारता हूँ, गुर्राता हूँ
बस गीत नहीं मैं गाता हूँ
चुप्पी मेरी दुखदायक है
तू मृदु साहित्य का नायक है

तू शंख बजाया करता है
मैं भाल उठाया करता हूँ
तू दांत पीसने लगता है
मैं तलवार खींच कर लड़ता हूँ

मैं ज़ुल्मी हूँ तू कहता है
मैं ज़ख़्मी तू न सहता है
मैं विष्णु हूँ तू जन प्रदेश
मैं ब्रह्मा हूँ तू नगर नरेश

शिव बनने की चाहता में तू चिलम जलाया करता है
मैं आग लगाया करता हूँ
दिन रात जगाया करता हूँ
तू रंग देख घबराता है
मैं खून नहाया करता हूँ

मैं हूँ विराट मैं हूँ विशाल
तीन लोक समाये बैठा हूँ
तू मेरे पग के नख समान
मैं रौंदता हूँ धरती
और आसमान
तू तुच्छ अदना सा मानव है
तू रोता है चिल्लाता है
बस प्रेमगीत ही गाता है
तू साहित्य इतिहास का विध्वंसक
मैं मानवता का संरक्षक
मैं क्रोधी हूँ मतवाला हूँ
मद मोह काम की ज्वाला हूँ

विविध हैं मेरे मोल अरे
तू क्यूँ इतना घबराता है
मैं साहित्य रचता हूँ रण का
तू प्रेमगीत बस गाता है 


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