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उम्र का घूँघट: अंतहीन सवाल

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक लड़की भी मन में अपने, कितने ख़्वाब सजोती होगी,
        
                                                    
                            
सोचती होगी वो भी अक्सर, काश लड़का मेरी उम्र का हो।
पर मायूस सा यह जो समाज है, इसकी अपनी ही ज़िद है,
जब दोनों का दिल ही ना मिले, तो फिर उनका क्या होगा?

शादी तो बस शादी होती है, रस्मों का एक ताना-बाना है,
बिना जाने एक-दूसरे को, बस रिश्ता जोड़ निभाना है।

दुनिया की इन नज़रों में, मानसिकताओं के आधार पर,
जो फ़ैसले थोपे जाते हैं, वो गलत हैं हर एक मोड़ पर।
जब सामने यह समाज आता है, तो प्रेम विवाह भी लाचार है,
जहाँ रस्मों की बेड़ियों के आगे, हर जज़्बात बेअसर है।
शादी तो बस शादी होती है, रस्मों का एक ताना-बाना है...

वहाँ पुरुष भी फिर शांत रहे, और स्त्री भी चुप रह जाती है,
जब सारे सवाल रुक जाते हैं, और घुटकर साँसें आती हैं।
जो लोग कभी गवाही देते थे, इस पवित्र पावन बंधन की,
वही लोग गवाही ख़त्म करते, मर्यादा कहकर इस मन की।
शादी तो बस शादी होती है, रस्मों का एक ताना-बाना है...

परमात्मा का बस नाम देकर, वो अपना पल्ला झाड़ लेते हैं,
और समाज के इस घूँघट में, कई अरमान दबाकर मार देते हैं।
फिर बड़ी शान से कहते हैं, कि हमें तो बस समाज देखना है,
पर इस दुनिया की रीत के आगे, किसका दर्द यहाँ पर लेखना है?

जो सही और गलत का आज तक, कोई फ़र्क भी ना कर पाए,
बिना किसी मजबूरी के ही, जिन्होंने हँसता हुआ रिश्ता तोड़ दिया।
हमें ऐसे खोखले नियमों का, अब कोई भी आधार नहीं चाहिए,
हमें तो बस इस दिल के जज़्बातों का, सच्चा सम्मान चाहिए।

परंपरा की आड़ में जो, हर पल पहरा देते हैं,
बात-बात पर जो टोकें, उन्हें हम 'समाज' कहते हैं।
पर क्या इनकी ये, बस यहीं पर रुक जाती हैं?
जब सब कुछ सही हो जाए, तो ये उम्र की दीवार लाती हैं।

लड़की हमेशा छोटी हो, बस यही शोर मचाता है,
यह समाज क्यों उम्र के नाम पर, इतना भेद सिखाता है?

कहते हैं लड़की छोटी हो, ताकि वो कुछ ना बोल सके,
अपने दिल के अरमानों को, समाज के आगे ना खोल सके।
लड़की रहे बस शांत यहाँ, यह सोच पुरानी गहरी है,
उम्र बराबर हो दोनों की, तो कहते बला ये टली है।

पर क्या कभी किसी ने पूछा, उस लड़की के भी मन से?
क्या उसका दिल बँध नहीं सकता,
अपनी पसंद के बंधन से?
लड़की हमेशा छोटी हो, बस यही शोर मचाता है...

अगर लड़की का मन चाहे कि, साथी उम्र में थोड़ा छोटा हो,
तो खड़ा यहाँ पर हो जाता, तुरंत पाबंदियों का कोठा हो।
यही समाज फिर चीख-चीखकर, झूठा शोर मचा देता है,
पुरुष हमेशा बड़ा रहेगा, यह रूढ़िवादी नियम सुना देता है।

क्यों स्त्री को हक नहीं यहाँ, अपनी मर्जी को चुनने का?
क्यों अधिकार नहीं है उसको,
अपने सपनों को बुनने का?
लड़की हमेशा छोटी हो, बस यही शोर मचाता है...

लड़के का मन भी तो शायद,
किसी बड़ी लड़की पर आ जाए,
दो-तीन बरस का फासला हो,
और दिल से दिल मिल जाए।

पर ये समाज बस पुरुष प्रधान, फैसलों को ही चुनता है,
स्त्री की मासूम मर्जी को, यह पैरों तले कुचलता है।
प्राणी तो इस दुनिया में, वो दोनों ही कहलाते हैं,
फिर उम्र के इस भेदभाव में, क्यों सच्चे जज़्बात हार जाते हैं?

यह बात कहना पूरी तरह सही है, कि समाज विज्ञान देखता है,
पर क्या वो हमारी बुद्धि, हमारा विवेक और मर्यादा भी देखता है?
कभी स्त्री के विरुद्ध खड़े नियम,
कभी पुरुष के खिलाफ यहाँ जंग है,
कहीं-कहीं दोनों ही उलझे हैं, जहाँ जीवन का हर रंग बेरंग है।
अगर समानता का सम्मान है,
तो शादी का असली मोल है,यह दो आत्माओं का बंधन है,
ना कि कोई व्यापार या तोल है।

शादी तो एक पावन बंधन है, अटूट प्रेम और विश्वास का,
यह सौदा नहीं है धन-लाभ का, ना किसी झूठे दिखावे की आस का।
एक-दूसरे के घरों को मिलकर, पावन स्वर्ग बनाना होता है,
यही तो वो आधार है जिससे, इस नए जग का निर्माण होता है।
पर यह खोखला समाज हमेशा, क्यों बेमतलब की दीवारें चुनता है?
अगर समानता का सम्मान है, तो शादी का असली मोल है...

क्या कभी किसी के कहने पर, कोई अपनी यादों को छोड़ सकता है?
क्या इस नवयुग की राह पर चलकर, कोई चिंतन से मुख मोड़ सकता है?
शादी तो नाम है अपने विचारों और मौलिक अधिकारों के सम्मान का,
जहाँ कोई डर ना हो बंदिश का, और मान रहे दोनों के स्वाभिमान का।
अगर समानता का सम्मान है, तो शादी का असली मोल है...

यह प्रेम और समर्पण का रिश्ता है, इसमें उम्र का कोई मोल नहीं,
जहाँ दिल से दिल का नाता हो, वहाँ रूढ़ियों का कोई बोल नहीं।
चाहे स्त्री का प्रेम उम्र में छोटा हो, या पुरुष का प्रेम बड़ी उम्र का हो,
सच्ची मोहब्बत के आगे, क्या फर्क पड़ता है।
कि कौन किस उम्र का हो?
पर यह समाज शायद,
आज तक शादी की इस पावन रीत को समझ ना पाया,
इसने रस्मों के नाम पर हमेशा,
बस अपना पहरा और डर ही फैलाया।

जब सब कुछ समाप्त हो जाता है, हर किस्सा ढल जाता है,
फिर भी न जाने क्यों, ये समाज नए सवाल उठाता है।
कैसे,
कब ,
और क्यों ,
के फेर में,
यह दुनिया उलझाती है,
न जाने कब तक ये, इंसान को तड़पाती हैं।

आओ अब इस समाज की सोच से, थोड़ा ऊपर उठकर देखें,
सच्चाई और स्पष्टता के डर से, थोड़ा आगे बढ़कर देखें।
दिल की धड़कन और हृदय से, कोई चूक न होने पाए,
ज़िंदगी की सच्ची ज़रूरतों से, कोई विमुख न होने पाए।

पर ये कैसी रीत है यहाँ की,
कैसा ये अजीब दस्तूर है,
कि बुनियादी आवश्यकताओं पर भी,
समाज सवाल करने को मजबूर है।

अब बहुत हुआ रस्मों का पहरा, अब तो ये दीवारें ढहनी चाहिए,
शादी और मोहब्बत की इस रीत में,
बस दिल की बात रहनी चाहिए।
हाँ,
इस समाज के हर सवाल को,
अब समझना होगा,
हमें अपनी खुशियों की खातिर,
इस पुरानी रीत और समाज मैं अपने विचार धरना होगा।
9 घंटे पहले
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