एनएच 19 ,
पर खड़ा एक शख्स,
किसी को निहारता,
घड़ी देखता बार-बार।
जैसे उसे मालूम हो पहले से ही,
इसी वक्त आने वाला है उसका यार।
पुकारती गाड़ियों की इस भीड़ में,
घनघोर शोर में भी वह शांत खड़ा रहा।
कितनी ही गाड़ियां आयीं और चली गयीं,
पर वह व्यक्ति वहीं पर अडिग अड़ा रहा।
जेब से निकाली ,
एक चुंदनी (सुरती) उसने,
मस्त-मलंग अंदाज़ में ,
चूना मिला कर मुस्कुराया।
बगल वाली एक गोमती के पास जाकर,
उसने एक मीठे पान का गुहार लगाया।
पान बनते-बनते ही ,
खत्म हुआ इंतज़ार,
एक शख्स साइकिल से ,
उसके पास आकर रुका।
हंसते और चिढ़ाते हुए बोला,
"का हो चल बे?"
दोस्त को देख कर उसकी खुशी का घड़ा छलका।
मस्ती के उजियारे में दोनों हंसते हुए बोले,
"हां हो चलो,
आज गलैचा (कालीन) का दूसर तागा लगे!"
रास्ते से गुजरते हुए मैं भी कुछ दूर निकल आया,
जहां से वे अपनी वीरान गलियों से काम की ओर भागे।
पीछे-पीछे मैं भी एक राही बन उनके लग गया,
मानो उनके इस सफर से कोई संदेश लेता जा रहा हूँ।
हर दस-बीस कदम पर उन्हें कोई न कोई मिल जाता,
और इस अकेले सफर को एक काफिला बनता पा रहा हूँ।
ना जाने कितने ही लोग उस टोली में जुड़ते चले गए,
क्या खूब हौसला था, सब काम की बात कर रहे थे।
रूमाल से माथे का पसीना पोंछते हुए,
कोई बच्चों की पढ़ाई,
तो कोई किसी की परदेस यात्रा का ज़िक्र कर रहे थे।
क्या मस्त-मौला मिज़ाज था उनका, क्या खूब कहानी थी,
दुनिया भर के दुख के बाद भी हंसी रुख पर छाई थी।
आखिर में सब मुस्कुरा कर बोले—
"घूम-फिर कर हम फिर अपने घर के हो जाएंगे,
एक दिन सब ठीक हो जाएगा।"
फिर रात की ट्यूबलाइट के धुंधले उजियारे में,
अपने ही रास्तों से वे वापस घर को आते हैं।
दिन भर के लंबे इंतज़ार की घड़ी ,
को पूरा कर,
वे फिर से अपनी उसी पुरानी आदत को दोहराते हैं।
फिर निकलती है जेब से वही चुंदनी की डिबिया,
मस्त-मौला अंदाज़ में उसे मलते और मुस्कुराते हैं।
साइकिल पर सवार होकर अपने परिवार के वास्ते,
थके-हारे कदमों से भी घर के लिए कुछ लेकर आते हैं।
कल सुबह फिर कब उठना है,
इसकी चिंता तो है,
पर वे इस फिक्र को छोड़,
नींद का भरपूर आनंद उठाते हैं।
बीते कल के मस्ताने दिनों की यादों में खोकर,
वे अपनी सारी थकान को पल भर में लुप्त कर जाते हैं।
मैं दूर खड़ा यूँ ही ,
उनकी इन मीठी बातों पर गौर कर रहा,
ना जाने कैसे,
उनके इस मस्त-मौलाना अंदाज़ को,
अपनी ही धीमी मुस्कुराहट में,
चुपके से दोहरा रहा।
क्या यह उनका आने वाला कल है या बस आज,
मैं क्या समझूँ?
पर एनएच 19 के रास्ते पर खड़े ये लोग,
दिल के बड़े खूबसूरत हैं।
इस व्यस्त हाईवे के बीचो-बीच बाज़ार की सनसनाती आवाज़ों में,
इनके दिल में कोई छल-कपट या कोई गुपचुप बात नहीं होती।
जो भी कहना है,
ये सीधे अपनी साफ़ बातों को सामने रख देते हैं,
छल और दिखावे की दुनिया से दूर,
ये कितने प्यारे लोग होते हैं।
ये भदोही के वो सीधे-साधे जादुई कलाकार हैं,
जो हर पल,
हर सांस में बस अपने तागे की बात करते हैं,
हाँ,
ये दिन-रात बस कालीन के उसी सुनहरे तागे की बात करते हैं।
अत्यधिक देर को ध्यान में रख,
श्रम की सीमा लांघ जाते हैं,
कार्यशीलता को पूर्ण करने,
वे जीवन-चक्र घुमाते हैं।
रात-दिन की हर एक पैमाइश को पैरों तले कुचलते हैं,
कदमों की आहट से अपनी थकान को वो लुप्त करते हैं।
अपनी ही धुन में बहते हुए,
आकांक्षा की राहों में लीन,
इस हुनर,
इस कला को वो धैर्य से रचते हैं।
अपनी प्रकृति,
अपनी लगन का वे ऐसा प्रमाण दिखलाते हैं,
हाँ!
वे अपनी कला को दुनिया के सामने शान से दिखलाते हैं,
दिखलाते हैं,
दिखलाते हैं... एनएच 19 के ठीक बीचों-बीच!
भदोही...!