बेमुक़ाबे क्यों हाल बना रखे हो,
मदहोश आँखों में क्यों सता रखे हो।
यूँ ही कब तक निराशा की कुंजी लेकर घूमोगे तुम,
एक चमक की रोशनी लेकर आओ।
क्या मैं कहूँ तुम्हें या विभिन्न दर्शकों में,
क्या इतनी ही परिभाषा की कल्पना की श्रेणी हो तुम?
क्या हम कहें तुमको और क्या तुम सुनाओगे,
क्या जाने ये पंछी भी क्या गुनगुना करते हैं।
यूँ चह-चहा हर शाम की हर बस्तियों में,
लाइट की एक गुहार जलती है।
क्या कहूँ मैं इन सूखी हुई टहनियों को,
जो बिन कहे बरसात से पहले मुरझा गई हैं, मुरझा गई हैं।
इतनी गर्मी तो नहीं जो तुम सूख गए हो,
यूँ ही बेतवा अब बरसात के मौसम में भी लौट आओ
क्या इतरा रही है,
इसकी क्या हालात बना रखे हो।