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मन का अंधकार

Abhishek Anant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन में अंधकार कहां से आते हैं?
        
                                                    
                            
इन्हें कौन हमारे मन में बिठाते हैं?
कभी कभी सही निर्णय पर आकर भी
अक्सर हम अंधकारवश गलती कर जाते हैं।

ये कहां से आते और कहां को जाते हैं?
क्या किसी को अपना अता-पता बताते हैं?
गर कोई जानता हो तो मुझे बताये!
क्यूँ डरपोक ही ज्यादा इसके चपेट में आते हैं?

अंधकार और विश्वास में अन्तर है
दोनों की कहानी रही हर मनवन्तर है
प्रत्येक को बारिकीयों से जान ले अब
नहीं तो अज्ञानता बनती मीठी खंज़र है।

विश्वास और अंधकार में निश्चित दूरी बनाये रखें
बिन समझे अंधकार को ना मजबूरी बनाये रखें
जीवन में कभी कभी अचानक दुख आ ही जाते है
जरूरी नहीं कि हमेशा ख्यालात वैसे ही बनाये रखें।

आइये,मिलकर हम को अब समझाते चले
गलत क्या और सही क्या है? इसे बताते चले
इसी में फंसकर कभी कभी जीवन खत्म हो जाता
यदि समय पर सही निर्णय ना जब हम ले पाते चले।

कवि/साहित्यकार
अभिषेक अवतारी
04/08/2016,वाराणसी


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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