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बेखबर राहें

Abhi Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर-1
        
                                                    
                            
राह कोई दिखाई देती नहीं
ना ही मंजिल दिखे ना कोई रास्ता
लक्ष्य कोई दिखाई देता नहीं है
मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर
राह कोई दिखाई देती नहीं
गलती से गलतियाँ तो हुई हैं मगर-2
ये कठिन है सफर काँटों की है डगर
सोचता हूँ मुझे माफ कर दें सभी
पर कोई गलतियाँ माफ करता नहीं
मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर
राह कोई दिखाई देती नहीं
मैंने की गलतियां तो सुधारूंगा मैं -3
और उजड़े चमन को निखारूंगा मैं
वक्त अच्छा कटा कुछ पता ना चला
पर बुरा वक्त जल्दी गुजरता नहीं
मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर
राह कोई दिखाई देती नहीं
इस बुरे दौर में मैं बुरा बन गया-4
जो था तारा कभी उल्का सा बन गया
था को है में बदलने की हिम्मत बहुत
है कठिन तो बहुत पर करूंगा इसे
पर कोई साथ अब मेरा देता नहीं
मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर
राह कोई दिखाई देती नहीं
गलतियों ने सिखाया बहुत कुछ मुझे-5
नींद से है जगाया इसी ने मुझे
अच्छे लम्हों कि थी भीड़ वो छठ गई
इस बुरेदौर में ख्याति सब घट गई
मैं करूं तप कठिन तक के हार नहीं
मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर
राह कोई दिखाई देती नहीं
इस कठिन दौर का अंत होगा कभी -6
है भरोसा मुझे खुद को चमकाऊंगा
जो भी बिगड़ा हुआ वह तो बन जाएगा
साथ दो तुम मेरा थोड़ा साहसा भी दो
नाव जो है फंसी गहरे मजधार में
साथ देने से वो भी निकल जायेगी
मैं चला जा रहा हूँ कहीं बेखबर
राह कोई दिखाई देती नहीं
अब चला जा रहा हूँ सही राह पर -7
राह भी दिख गई और मंजिल दिखी
कितना आसान हो जाएगा यह सफर
जब मेरे हाँथ पर हाँथ तेरा भी हो।
अब चला जा रहा हूँ सही राह पर
राह भी दिख गई और मंजिल दिखी
-अभिषेक कुमार
 
2 घंटे पहले
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