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ज़िंदगी एक शायरी

Abhay Gaur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी कभी तिराहे पर आकर रुकती है
        
                                                    
                            
या कभी दाहिने मुड़ जाती है और
कुछ पल बाद बायें मुड़ जाती है
पर ज़िंदगी शनैः शनै ढलती जाती है
ज़िंदगी ख़ुद से ऐसे लिपटती है
जैसे हवाएँ गुल से लिपट जातीं है
इसको न रंक समझा न ही राजा
मुसलसल ये एक पहेली बनती जाती है
पर ज़िंदगी सिर्फ शायरी है अवधी
जो हमेशा लिखी, पढ़ी और सुनी जाती है
-अभय ‘अवधी’
3 घंटे पहले
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