शायरी तो बस इश्क़ की कलाकारी है
हर एक शेर में तेरे कूचे पे नज़रदारी है
मोहब्बत से कोई सर कलम कर गया
जान देना भी इश्क़ में अदाकारी है
ये दौलतें हुस्न,हसीन चेहरा और सुरूरी आँखें
अब सब खुलेआम मेरे ज़िबह की तैयारी है
ये क़त्ल-ए-ग़ारत का घर है तो इसी में रहो
तनिक कुछ और लम्हे हमारे आग़ोश मे रहो
ऐसे समाओ मुझमें कि जैसे लहूँ रगों में
क्या ज़रूरत है तुम सबकी नज़रों में रहो
हमारे प्यार की फ़सल जब पकने लगी
सारे गाँव में उसकी ख़ुशबू फैलने लगी
पुरज़ोर कोशिश की पर उससे मिल न सका
घंटे बजने लगे और सुबह होने लगी
-अभय ‘अवधी’