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हमारी पहचान

Abhay Gaur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कंकड़ों की बौछारों में भी हमने
        
                                                    
                            
शीशे की दीवार उठाई है
ज़ख़्मों को हँसी में छुपा कर
हमारी मुस्कान आई है
जब मिले काँटे राहों में तो
फूलों की याद न आईं हैं
लोग गिराते हैं हमको पर
हर बार उठने की आदत पाईं हैं
घनघोर अँधेरा है राहों में
पर हमने हर शमा जलाईं हैं
खामोश हैं हम आज मगर पर
कल ने हमारी पहचान बनाई है
-अभय ‘अवधी’
5 घंटे पहले
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