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हमारी पहचान

                
                                                         
                            कंकड़ों की बौछारों में भी हमने
                                                                 
                            
शीशे की दीवार उठाई है
ज़ख़्मों को हँसी में छुपा कर
हमारी मुस्कान आई है
जब मिले काँटे राहों में तो
फूलों की याद न आईं हैं
लोग गिराते हैं हमको पर
हर बार उठने की आदत पाईं हैं
घनघोर अँधेरा है राहों में
पर हमने हर शमा जलाईं हैं
खामोश हैं हम आज मगर पर
कल ने हमारी पहचान बनाई है
-अभय ‘अवधी’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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