ज्ञान आज पूछता हूँ मैं तुम से कुछ प्रश्न अटपटे
तुम क्यों होते हो इतने गूढ़,दुरूह और क्लिष्ट
आखिर क्यों छिपे रहते हो परिश्रम की ओट में
क्यों बना रखा है आवरण अपने चारों तरफ़ प्रश्नों का
क्यों खोये हुए हैं सभी उत्तर तुम्हारी गहराई में
कहो,कुछ तो कहो क्यों हो मौन अनंत काल से
क्या समझते नहीं हो हम मूढ़ जनो की वेदना
क्यों नहीं बन जाते सरल,सुगम्य और सुबोध
बतलाता है ये जग कि तुम छुपे हुए हो मोटे-मोटे ग्रंथों में
क्या अनुभव और योग्यता का नहीं है कोई मोल तुम्हारे बिन
ये तो बताओ ज़रा क्यों कर थे तुम निपट अनपढ़ कबीर के पास
या चक्षुहीन सूर और मूरख कालिदास के साथ
आखिर क्या समझाना चाहते थे तुम जगत को
कौन-सी भ्रांतियों को करन चाहते थे निर्मूल
अलाउद्दीन खिलजी और अकबर जैसे निपट
अंगुठा-टेक को कैसे स्थाई रखा सत्ता के शीर्ष पर इतने वर्ष
हम आलसियों के बारे में क्यों कुछ नहीं सोचते
जो चाहते हैं बिना कुछ किये ही मिल जाओ तुम
न करनी पड़े मेहनत कड़ी मिल जाये कोई जादू की छड़ी
समा जाओ तुम अंतःकरण में बिना किये संकोच
कभी तोड़ कर देखो अपने नीति-नियमों को
क्योंकि नियमों को तोड़ने का अलग ही मज़ा है
बहा दो थोड़ी कृपानीर अपने इन सुस्त दासों पर भी
ताकि हो सके कुछ कल्याण हमारा भी
- नीर
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