तुम नज़रों से दूर क्या गए नज़ारे चले गए!
मिरे दिल को लुभा रहे थे वो सारे चले गए!!
तारों से मग़रूर चाॅंदनी ने न जाने क्या कहा!
चन्दा को तन्हा छोड़ सभी तारे चले गए!!
तुम क्या गए चमन की सारी दिलकशी गई!
मिलन की रुत के इश्क़िया इशारे चले गए!!
वैसे तो हर दहलीज़ तिरी दहलीज़ नहीं थी!
हर दहलीज़ पे हम तुम को पुकारे चले गए!!
मिरी कश्ती को यूॅं भॅंवर ने आग़ोश में लिया!
इन नज़रों से कितनी दूर किनारे चले गए!!
मिलन की रात आई जुदाई की रात बन के!
हम जिन के आसरे थे वो सहारे चले गए!!
तुम लौट भी आओ तो कभी वो लौटेंगे नहीं!
जो जोश-ए-इश्क़ संग तुम्हारे चले गए!!
क़ज़ा भी ग़रीबों के लिए इक निजात बन गई!
इस दुनिया से यूॅं नसीब के मारे चले गए!!
किसी और से शिकायत हम क्या करें 'परवेज़'!
हमें जिन पे नाज़ था वो हमारे चले गए!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद