जो गुज़ारी न जा सकी हम से,
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है।
हँसते चेहरे के पीछे छुपाकर दर्द,
हम ने हर शाम यूँ सँवारी है।
जिन्हें अपना समझ के बैठे थे,
उनसे ही सबसे ज़्यादा दूरी है।
कुछ ख़्वाब आँखों में मर गए चुपचाप,
कुछ उम्मीदें अभी भी भारी हैं।
हमने माँगा था बस सुकून थोड़ा-सा,
मगर हिस्से में रात सारी है।
जिसको खोने का डर था उम्र भर,
आज उसकी कमी भी प्यारी है।
किसी से शिकवा नहीं, न कोई गिला,
बस ख़ुद से थोड़ी-सी बेकरारी है।
अब जो पूछे कोई हाल-ए-दिल मेरा,
कह देना—बस ज़िंदगी गुज़ारी है।
जो गुज़ारी न जा सकी हम से,
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है।