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आज के हालात

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ ख्याल देखें
        
                                                    
                            

ज़िन्दगी को सबक सिखाने दे
मौत थोड़ा करीब आने दे
लग रही है हवा चरागों को
थम जरा चिटकिनी लगाने दे
कर रहें है शहर मे दंगा जो
कौन मज़हब जरा बताने दे
वो मुझे घर नहीं बुलाता है
पर उसे घर मुझे बुलाने दे
वो मिरा हमसफ़र न हो पाया
चल उसे हमसफ़र बनाने दे


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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