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Lyricist Indeevar Death Anniversary: बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम

आसिफ़ इक़बाल

Sahitya
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                                                  'बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम, 
प्यार की दुनिया में ये पहला क़दम'


भले ही इस खूबसूरत गीत को वजूद में आए 65 साल गुज़र गए हों, लेकिन इसकी तासीर आज भी मोहब्बत बिखेरे हुए है। यह महज़ एक गीत का जन्म ही नहीं था, बल्कि बॉलीवुड में एक ऐसे दौर का आग़ाज़ था, जिसने गीतों में लोक संगीत और मिट्टी की खुशबू भर दी। संगीत की दुनिया में एक ऐसे दिवाकर का उदय हो चुका था, जिसकी रौशनी सतरंगी थी और यह दिवाकर थे मशहूर गीतकार इंदीवर...इंदीवर ने ज़मीन से जुड़े लोगों की आम भाषा के शब्दों को जब गीतों में पिरोकर उन्हें वापस किया, तो श्रोताओं को उसमें एक अपनापन लगा। उस वक्त उर्दू शायरी से भरपूर गीतों का बॉलीवुड में बोल बाला था, बावजूद इसके उन्होंने हल्के-फुल्के शब्दों से वज़नदार नग़मों को लोकप्रिय बनाया। भले ही उनके गीतों में उर्दू के शायराना शब्दों की कमी हो, लेकिन मोहब्बत की नज़ाकत और दर्द का अहसास कहीं से भी कम नहीं होता। उनके गीतों से श्रोता आसानी से राब्ता कायम कर लेता है। क्या गांव, क्या गली, क्या डगर, क्या शहर, जहां भी इंदीवर साहब के गाने गूंजे, फ़िज़ा की रंगत ही बदल गई। 
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बॉलीवुड में क़रीब 50 दशकों तक इंदीवर साहब की क़लम सुरों को अल्फ़ाज़ से नवाज़ती रही। बॉलीवुड में लोक गीतों को जि़ंदा करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। इंदीवर के गीतों की लंबी फेहरिस्त में..फिल्म सरस्वती चंद्र का यह गीत

'मैं तो भूल चली बाबुल का देश, 
पिया का घर प्यारा लगे
कोई मैके को दे दो संदेश 
पिया का घर प्यारा लगे'

आज भी पत्नी-पत्नी के प्रेम का प्रमाण बना हुआ है। बाबुल, पिया, मैके जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल होने वाले शब्द अपनेपन का अहसास दिलाते हैं। इसी फ़िल्म का एक और गीत  

'चंदन सा बदन चंचल चितवन
धीरे से तेरा ये मुस्काना
मुझे दोष न देना जग वालों
हो जाऊं अगर मैं दीवाना'

प्रेमिका की तारीफ़ में सरल शब्दों में इससे अच्छी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। भले ही यह गीतकार इंदीवर के नाम से मक़बूलियत हासिल किए हों, पर इनका असली नाम श्यामलाल बाबू राय था।

1924 में इनका जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी में हुआ था। इंदीवर की गीतकार बनने की बचपन से ही दिली तमन्ना थी। एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले इंदीवर के लिए ये ख़्वाब मुश्किल था, नामुमकिन नहीं और इसी ख़्वाब का दामन थामकर वो मुंबई आ गए। 1946 में आई फ़िल्म डबल क्रॉस में उन्हें बतौर गीतकार काम करने का मौक़ा मिला, लेकिन यह फ़िल्म नाक़ाम साबित हुई। शोहरत की इमारत बनाने निकले इंदीवर को लगभग 5 वर्ष तक फ़िल्म इंडस्ट्री मे संघर्ष करना पड़ा और 1951 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'मल्हार' के गीत 'बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम...' ने उनकी शोहरत की इमारत की नींव रख दी। उन्होंने अपने सिने करियर में लगभग 300 फ़िल्मों के लिए गीत लिखे। 

इंदीवर साहब की क़लम के कमाल से अनमोल गाने वजूद में आए, जिनका हर लफ़्ज़ जज़्बातों से लबरेज़ होता है। 'फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है', 'ओह रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में', 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे', 'मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती', 'जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे', 'हम छोड़ चले हैं महफ़िल को, याद आए कभी तो मत रोना', 'तेरे चहरे में वो जादू है', 'दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा', 'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये', 'होठों से छू लो तुम', 'दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है' जैसे गीत उनकी कल्पना की किसी और दुनिया में ले जाते हैं।

मनोज कुमार को भारत कुमार बनाने में इंदीवर साहब का बड़ा योगदान रहा है। 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे',' मेरे देश की धरती सोना उगले-उगले हीरे-मोती', 'है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं', 'क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या' जैसे गीत लिखकर उन्होंने मनोज कुमार को नए ख़िताब से नवाज़ा। इंदीवर साहब की जोड़ी संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी के साथ ख़ूब जमी और इस जोड़ी ने कई दशकों तक श्रोताओं को एक से बढ़कर एक नग़में परोसे। ऐसी फिल्मों में उपकार, दिल ने पुकारा, सरस्वती चंद्र, पूरब और पश्चिम, जॉनी मेरा नाम, यादगार, सफर, सच्चा झूठा, पारस, हेराफेरी, डॉन, उपासना, कसौटी, धर्मात्मा, क़ुर्बानी प्रमुख हैं। कल्याणजी-आनंदजी के अलावा इंदीवर के पसंदीदा संगीतकारों में बप्पी लाहिरी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकार भी शामिल हैं। इसके अलावा 'जीवन से भरी तेरी आंखे', 'ज़िंदगी का सफ़र' और 'जो तुमको हो पसंद' जैसे गीतों ने अपने ज़माने में सुपर स्टार राजेश खन्ना को एक अलग पहचान दिलाई। 
 

इंदीवर साहब ने अपने गीतों से फ़िल्म निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन की फ़िल्मों को हिट कराने में अहम योगदान दिया। जब तक इंदीवर साहब इस दुनिया में रहे, राकेश रौशन की फिल्मों के लिए गाने लिखते रहे। फ़िल्म किंग अंकल का गाना, इस जहां की नहीं हैं तुम्हारी आंखें, आसमां से ये किसने उतारी आंखें, हो या करन-अर्जुन का जाती हूं मैं, जल्दी है क्या? प्यार से भरपूर ये दोनों ही गाने ज़बरदस्त हिट साबित हुए। लगभग तीन दशक तक अपने गीतों से श्रोताओं को भाव विभोर करने वाले इंदीवर 27 फरवरी 1999 को हमेशा-हमेशा के लिए दुनिया से रुख़सत हो गए और हमें ज़िंदगी और मौत का फ़र्क कुछ इस अंदाज़ में समझा गए...

'ज़िंदगी को बहुत प्यार हमने किया
मौत से भी मोहब्बत निभाएंगे हम
रोते-रोते ज़माने में आए मगर
हंसते-हंसते ज़माने से जाएंगे हम...'
3 वर्ष पहले
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