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विश्व योग दिवस पर ये हैं चुनिंदा शेर और कविताएं...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  समूची दुनिया में 21 जून को विश्व योग दिवस मनाया जाता है। भारत की इस प्राचीन परंपरा का दुनिया में यशोगान हम भारतवासियों के लिए एक गौरव है। विश्व योग दिवस के अवसर पर हम योग को केंद्रित करते हुए छोटी कविताएं, शेर और शायरी आपकी नजर कर रहे हैं। हमें विश्वास है इन्हें पढ़कर आपके मन को सुकून मिलेगा। आप सबको विश्व योग दिवस की बधाई।     
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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योग: शमशेर बहादुर सिंह

सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता
केश-वन में झिलमला कर डूब जाता
स्वप्न-सा निस्तेज गतचेतन कुमार

कमल तल में खिले सर के,
शीर्षासन से।

 

चपल शीतल-दृग...

जागरण की चेतना से मैं नहा उट्ठा।
हवा है मेरी असंख्य
दृष्टियाँ अनुक्षण परस्पर देखतीं खुल-मुँद,
असंख्य
चपल शीतल-दृग
पुलक पल लिए, अपरम्पार।

चट-चटककर कमर बोली...

मैं कमल के नाल पर बैठा हुआ हूँ
एक एड़ी पर टिकाए मौन।
---

चट-चटककर कमर बोली...(क्या?)-
"घूमती लचती दिशाओं में
मैं पताका-सी।"

 

जब हम किसी पर एकाग्र होते हैं...

योग मन को एक करने का अभ्यास है। जब हम किसी पर एकाग्र होते हैं तो हमारे मन मस्तिष्क की तंत्रिकाएं हमें शक्ति ही देती हैं। यह भी एक योग है। ये शेर भी आपको योग का रूहानी एहसास दे सकते हैं।

हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में।

मैं तेरा नुमाइंदा हूं...

जिस दिन से चला हूं मिरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।

जिंदगी तू मुझे पहचान न पाई लेकिन
लोग कहते हैं कि मैं तेरा नुमाइंदा हूं।

तेरी ख़ुशबू आए...

बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक
कोई ख़ुशबू मैं लगाऊं, तेरी ख़ुशबू आए।

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आंखें हमारी कहां से लाएगा।

-बशीर बद्र

योग साधना-पुष्पिता

प्यार की
पहली सिहरन में
मुँदी पलकों के भीतर
जगी आँखों ने जाना
देह-भीतर
देह का जादू।

 

नवानुभूति से भरकर...

खामोश शब्दों ने किलक कर
जन्म लिया
नवानुभूति से भरकर।

अनुभूति की उड़ान-सुख में
अनुभव किया
अपनी ही देह का अमृतस्राव
प्रिय अधर में।

भोग की साधना से नहीं...

चाँद निहारने वाली आँखों ने
जाना चाँद का सुख
जो साधना के योग से मिलता है
भोग की साधना से नहीं।

तुम्हारे स्पर्श ने
पिलाया है प्यार का अमृत
अपने स्पर्श में
भर लेना चाहती हूँ तुम्हारे अंतरंग का रोम-रोम।

योग-वियोग: गुलाब खंडेलवाल

आपसे दो बात होकर रह गयी
रंग की बरसात होकर रह गयी
चाँद बदली के न बाहर आ सका
रात, काली रात होकर रह गयी

तुम जो दुविधा में रही प्रेम की विवशता की
तीर इस भाव से फेंका कि पार हो न सका
मैं तड़पता ही रहा पीर लिये प्राणों में
मरके भी मर न सका, हँस न सका, रो न सका

यों तड़पता हूँ मैं अकेले में...

खो गयी तुम जगत के रेले में
यों तड़पता हूँ मैं अकेले में
अपने माता-पिता से छूटा हुआ
जैसे बालक हो कोई मेले में

बोलना किसीसे, देख लेना किसी और को
हृदय किसीका छीन, देना किसी और को
आपकी कला थी, किन्तु काल बनी प्राण की
नाव में बिठा के मुझे, खेना किसी और को  


साभाार-कविता कोश
8 वर्ष पहले
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