नवरात्रि विशेष: बस मुझे किसी तरह जी लेने दो...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली Updated Sat, 17 Mar 2018 06:38 PM IST
महिला दिवस
उदय प्रकाश हिंदी के उन कवियों में से है जिनके यहां यथार्थ एहसासभर नहीं है। बल्कि उनकी कविताओं में यथार्थ अपने तीखेपन के साथ उपस्थित होकर हमारे समय और समाज की पड़ताल करता है। औरत शब्द को उदय प्रकाश ने भी अन्य साहित्यकारों की तरह गहराई से समझा है। वाणी प्रकाशन की उदय प्रकाश रचित 'पचास कविताएं नयी सदी के लिए चयन' में 'औरतें' शीर्षक की कविता हम अपने पाठकों के लिए काव्य चर्चा के तहत रख रहे हैं। औरतें... वह औरत पर्स से खुदरा नोट निकाल कर कंडक्टर से अपने घर जाने का टिकट ले रही है उसके साथ अभी ज़रा देर पहले बलात्कार हुआ है उसी बस में एक दूसरी औरत अपनी जैसी ही लाचार उम्र की दो-तीन औरतों के साथ प्रोमोशन और महंगाई भत्ते के बारे में बातें कर रही है उसके दफ़्तर में आज उसके अधिकारी ने फिर मीमो भेजा है  

वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई... वह औरत जो सुहागन बने रहने के लिए रखे हुए है करवा चौथ का निर्जल व्रत वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई सोती सोती अचानक चिल्लाती है एक और औरत बालकनी में आधीरात खड़ी हुई इंतज़ार करती है अपनी जैसी ही असुरक्षित और बेबस किसी दूसरी औरत के घर से लौटने वाले अपने शराबी पति का संदेह, असुरक्षा और डर से घिरी एक औरत अपने पिटने से पहले बहुत महीन आवाज़ में पूछती है पति से - कहां खर्च हो गये आपके पर्स में से तनख्वाह के आधे से ज़्यादा रुपये ?  

एक औरत अपने बच्चे को नहलाते हुए यों ही रोने लगती है फूट-फूट कर... एक औरत अपने बच्चे को नहलाते हुए यों ही रोने लगती है फूट-फूट कर और चूमती है उसे पागल जैसी बार-बार उसके भविष्य में अपने लिए कोई गुफ़ा या शरण खोज़ती हुई एक औरत के हाथ जल गये हैं तवे में एक के ऊपर तेल गिर गया है कड़ाही में खौलता हुआ अस्पताल में हज़ार प्रतिशत जली हुई औरत का कोयला दर्ज कराता है अपना मृत्यु-पूर्व बयान कि उसे नहीं जलाया किसी ने उसके अलावा बाक़ी हर कोई है निर्दोष ग़लती से उसके ही हाथों फूट गयी थी किस्मत और फट गया था स्टोव  

एक औरत नाक से बहता ख़ून पोंछती हुई बोलती है... एक औरत नाक से बहता ख़ून पोंछती हुई बोलती है कसम खाती हूं, मेरे अतीत में कहीं नहीं था कोई प्यार वहां था एक पवित्र, शताब्दियों लंबा, आग जैसा धधकता सन्नाटा जिसमें सिंक-पक रही थी सिर्फ़ आपकी खातिर मेरी देह एक औरत का चेहरा संगमरमर जैसा सफ़े़द है उसने किसी से कह डाला है अपना दुख या उससे खो गया है कोई ज़ेवर एक सीलिंग की कड़ी में बांध रही है अपना दुपट्टा उसके प्रेमी ने सार्वजनिक कर दिये हैं उसके फोटो और प्रेमपत्र

बस मुझे किसी तरह जी लेने दो... एक औरत फोन पकड़ कर रोती है एक अपने आप से बोलती है और किसी हिस्टीरिया में बाहर सड़क पर निकल जाती है कुछ औरतें बिना बाल काढ़े, बिना किन्हीं कपड़ों के बस अड्डे या रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर खड़ी हैं यह पूछती हुई कि उन्हें किस गाड़ी में बैठना है और जाना कहां है इस संसार में एक औरत हार कर कहती है -तुम जो जी आये, कर लो मेरे साथ बस मुझे किसी तरह जी लेने दो  

और उसके शव के पास रो रहा है उसका डेढ़ साल का बेटा... एक पायी गयी है मरी हुई बिल्कुल तड़के शहर के किसी पार्क में और उसके शव के पास रो रहा है उसका डेढ़ साल का बेटा उसके झोले में मिलती है दूध की एक खाली बोतल, प्लास्टिक का छोटा-सा गिलास और एक लाल-हरी गेंद, जिसे हिलाने से आज भी आती है घुनघुने जैसी आवाज़ एक औरत तेज़ाब से जल गयी है खुश है कि बच गयी है उसकी दायीं आंख एक औरत तंदूर में जलती हुई अपनी उंगलियां धीरे से हिलाती है जानने के लिए कि बाहर कितना अंधेरा है

एक पोंछा लगा रही... एक पोंछा लगा रही है एक बर्तन मांज रही है एक कपड़े पछींट रही है एक बच्चे को बोरे में सुला कर सड़क पर रोड़े बिछा रही है एक फ़र्श धो रही है और देख रही है राष्ट्रीय चैनल पर फ़ैशन परेड एक पढ़ रही है न्यूज़ कि संसद में बढ़ाई जायेगी उनकी भी तादाद  

'मुझे फेंक कर किसी नाले में जल्दी घर लौट आना... एक औरत का कलेजा जो छिटक कर बोरे से बाहर गिर गया है कहता है - 'मुझे फेंक कर किसी नाले में जल्दी घर लौट आना, बच्चों को स्कूल जाने के लिए जगाना है नाश्ता उन्हें ज़रूर दे देना, आटा तो मैं गूंथ आई थी राजधानी के पुलिस थाने के गेट पर एक-दूसरे को छूती हुईं ज़मीन पर बैठी हैं दो औरतें बिल्कुल चुपचाप लेकिन समूचे ब्रह्मांड में गूंजता है उनका हाहाकार हज़ारों-लाखों छुपती हैं गर्भ के अंधेरे में इस दुनिया में जन्म लेने से इनकार करती हुईं लेकिन वहां भी खोज़ लेती हैं उन्हें भेदिया ध्वनि-तरंगें वहां भी, भ्रूण में उतरती है हत्यारी तलवार । उदय प्रकाश पचास कविताएं नयी सदी के लिए चयन वाणी प्रकाशन  

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