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जन्मदिन विशेष : इश्क़ की नाजुक़मिज़ाजी पर वसीम बरेलवी के उम्दा 10 शेर... 

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  उर्दू साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाले शायर वसीम बरेलवी इश्क़ कई पक्षों को अपनी शाइरी में उतारते हैं। इश्क़मिज़ाजी तो उर्दू शाइरी का हिस्सा रहा है लेकिन वसीम अपनी शाइरी में प्रेम को जिस तरह ढालते हैं वह किसी अल्हड़ नव प्रेमी जोड़ों के मन को दर्शाता है। आइए पढ़ते हैं उनके 10 उम्दा शेर  

मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है 
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है 
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तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे...

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

मैं नज़र भर के तिरे जिस्म को जब देखता हूँ 
पहली बारिश में नहाया सा शजर लगता है 

कि आसमाँ के फ़रिश्तों को प्यार आता था...

खुल के मिलने का सलीक़ा आप को आता नहीं 
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं 

वो मेरे बालों में यूँ उँगलियाँ फिराता था 
कि आसमाँ के फ़रिश्तों को प्यार आता था 

जो न कहना चाहिए था कह गया...

सिर्फ़ तेरा नाम ले कर रह गया 
आज दीवाना बहुत कुछ कह गया 

हाए क्या दीवानगी थी ऐ 'वसीम' 
जो न कहना चाहिए था कह गया 

किसी को छोड़ना हो तो मुलाक़ातें बड़ी करना...

बहुत बेबाक आँखों में तअ'ल्लुक़ टिक नहीं पाता 
मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है 

मोहब्बत में बिछड़ने का हुनर सब को नहीं आता
किसी को छोड़ना हो तो मुलाक़ातें बड़ी करना

मैं भी उसे खोने का हुनर सीख न पाया
उस को भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता
8 वर्ष पहले
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