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'अमीर' क़ज़लबाश की 5 जिंदादिल ग़ज़लें

शरद मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  'अमीर' क़ज़लबाश ने भी अपनी शायरी और ग़ज़लों में दुनिया की एक जिन्दा तस्वीर पेश की है। उनकी कुछ ग़ज़लों में जिन्दगी की जिंदादिली देखते ही बनती है।  हम ऐसी ही चुनिंदा ग़ज़लों का यहां आपसे परिचय कराने जा रहे हैं।       
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है...

इक परिंदा अभी उड़ान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है

जिस को देखो वही है चुप-चुप सा
जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है

खो चुके हम यक़ीन जैसी शय
तू अभी तक किसी गुमान में है

ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन
आईना भी इसी चटान में है

सर-बुलंदी नसीब हो कैसे
सर-निगूँ है के साए-बान में है

ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जागते सोते
कोई आसेब इस मकान में है

आसरा दिल को इक उम्मीद का है
ये हवा कब से बाद-बान में है

ख़ुद को पाया न उम्र भर हम ने
कौन है जो हमारे ध्यान में है

आज मैं उस से बिछड़ कर देखूँ...

बंद आँखों से वो मंज़र देखूँ
रेग-ए-सहरा को समंदर देखूँ

क्या गुज़रती है मेरे बाद उस पर
आज मैं उस से बिछड़ कर देखूँ

शहर का शहर हुआ पत्थर का
मैं ने चाहा था के मुड़ कर देखूँ

ख़ौफ़ तंहाई घुटन सन्नाटा
क्या नहीं मुझ में जो बाहर देखूँ

है हर इक शख़्स का दिल पत्थर का
मैं जिधर जाऊँ ये पत्थर देखूँ

कुछ तो अंदाज़-ए-तूफ़ाँ हो ‘अमीर’
नाव काग़ज़ की चला कर देखूँ

अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा...

मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा

गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर
अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा

उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा

यक़ीं न आए तो इक बात पूछ कर देखो
जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा

उस आस्तीन से अश्कों को पोछने वाले
उस आस्तीन से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा

रिश्तों में हम-वारी रख...

नज़र में हर दुश्वारी रख
ख़्वाबों में बेदारी रख

दुनिया से झुक कर मत मिल
रिश्तों में हम-वारी रख

सोच समझ कर बातें कर
लफ़्ज़ों में तह-दारी रख

फ़ुटपाथों पर चैन से सो
घर में शब-बेदारी रख

तू भी सब जैसा बन जा
बीच में दुनिया-दारी रख

एक ख़बर है तेरे लिए
दिल पर पत्थर भारी रख

ख़ाली हाथ निकल घर से
ज़ाद-ए-सफ़र हुश्यारी रख

शेर सुना और भूखा मर
इस ख़िदमत को जारी रख

लेकिन तमाम रात पिघलना पड़ा मुझे...

वो सरफिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे
मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे

महसूस कर रहा था उसे अपने आस पास
अपना ख़याल ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे

सूरज ने छुपते छुपते उजागर किया तो था
लेकिन तमाम रात पिघलना पड़ा मुझे

मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू थी मेरी ख़ामुशी कहीं
जो ज़हर पी चुका था उगलना पड़ा मुझे

कुछ दूर तक तो जैसे कोई मेरे साथ था
फिर अपने साथ आप ही चलना पड़ा मुझे


'अमीर' क़ज़लबाश
6 वर्ष पहले
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