तेग इलाहाबादी जिनका असली नाम मुस्तफ़ा ज़ैदी था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले तेग विभाजन से पहले तक यही रहे और विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए। कराची में बैठकर शायरी करने वाले 'तेग' अपने नाम के आगे 'इलाहाबादी' होने की स्मृति को कभी नहीं दफ़न कर पाये।
उनकी शायरी में उनकी स्मृतियों का ये दर्द महसूस किया जा सकता है।
आगे पेश है उनके चुनिंदा शेर----
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इश्क़ इन ज़ालिमों की दुनिया में
कितनी मज़लूम ज़ात है ऐ दिल
इस तरह होश गँवाना भी कोई बात नहीं
और यूँ होश से रहने में भी नादानी है
कोई इस देश का मिल जाए तो इतना पूछे
आजकल अपने मसीहा-नफ़सां कैसे हैं
आंधियां तो सुना इधर भी आयी
कोपलें कैसी हैं शीशों के मकां कैसे हैं
कई समंदर पार से आयी गोरी पिया के देस
रूप विदेसी लेकिन जीवन पूरब का संदेस
लम्बी लम्बी पलकें जिनमे तलवारों की काट
नीली नीली आंखें जैसे जमुनाजी का घाट
मैं किस के हाथ पे अपना लहू तलाश करूँ
तमाम शहर ने पहने हुए हैं दस्ताने
दिल के रिश्ते अजीब रिश्ते हैं
साँस लेने से टूट जाते हैं