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निराला का काव्य और पूंजीवाद का विरोध...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काव्य में सामाजिक चेतना काफी मुखर ढंग से सवाल जवाब करती है। निराला ने कुकुरमुत्ता कविता में पूंजीवाद पर करारे प्रहार किए हैं। गुलाब को बुर्जुआवादी मानसिकता का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कुकुरमुत्ता को सर्वहारा वर्ग का प्रतीक बताते हुए विचार व्यक्त किए हैं।

मैं कुकुरमुत्ता हूँ,
पर बेन्जाइन वैसे
बने दर्शनशास्त्र जैसे।
ओमफ़लस और ब्रहमावर्त
वैसे ही दुनिया के गोले और पर्त
जैसे सिकुड़न और साड़ी,
ज्यों सफ़ाई और माड़ी।
कास्मोपालिटन और मेट्रोपालिटन
जैसे फ़्रायड और लीटन।
फ़ेलसी और फ़लसफ़ा
जरूरत और हो रफ़ा।
सरसता में फ़्राड
केपिटल में जैसे लेनिनग्राड।
सच समझ जैसे रकीब
लेखकों में लण्ठ जैसे खुशनसीब
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निराला के काव्य का मूल तत्व मानवतावाद है...

निराला ने मानवीय मूल्यों और नैतिकता को काफी सशक्त ढंग से पेश किया है। निराला के काव्य का मूल तत्व मानवतावाद है। प्रगतिशील काव्य के जरिए उन्होंने मानव जीवन को प्रखर गति प्रदान की है। वे मानव को गतिशील और विकासशील बनाना चाहते हैं। पूंजीवाद का विरोध करते हुए उन्होंने सर्वहारा समाज के हित की बात अपनी कविताओं में उठायी।

मैं डबल जब, बना डमरू
इकबगल, तब बना वीणा।
मन्द्र होकर कभी निकला
कभी बनकर ध्वनि छीणा।
मैं पुरूष और मैं ही अबला।
मै मृदंग और मैं ही तबला।
चुन्ने खां के हाथ का मैं ही सितार
दिगम्बर का तानपूरा, हसीना का सुरबहार।
मैं ही लायर, लिरिक मुझसे ही बने
संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, ग्रीक, लैटिन के जने
मन्त्र, गज़लें, गीत, मुझसे ही हुए शैदा
जीते है, फिर मरते है, फिर होते है पैदा।
वायलिन मुझसे बजा
बेन्जो मुझसे सजा।
घण्टा, घण्टी, ढोल, डफ़, घड़ियाल,
शंख, तुरही, मजीरे, करताल,
करनेट, क्लेरीअनेट, ड्रम, फ़्लूट, गीटर,
बजानेवाले हसन खां, बुद्धू, पीटर,
मानते हैं सब मुझे ये बायें से,
जानते हैं दाये से।
 

गरीबी-भय-भूख को भी उन्होंने अपनी कविताओं में पेश किया है...

मानवीय मूल्यों का ध्यान रखते हुए उन्होंने सामाज को कलंकित करने वाली हर परंपरा पुरजोर विरोध किया। अपने युग की सामाजिक राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों से वह पूरी तरह परिचित थे। आजादी का करुण क्रंदन उनके काव्य में स्पष्ट झलकता है। गरीबी-भय-भूख को भी उन्होंने अपनी कविताओं में पेश किया है।

...जैसे कुकुरमुत्ते के प्रेम से भरी गोली दगी।
भूल गयी, उसका था गुलाब पर जो कुछ भी प्यार
सिर्फ़ वह गोली को देखती रही निगाह की धार।
टूटी गोली जैसे बिल्ली देखकर अपना शिकार
तोड़कर कुकुरमुत्तों को होती थी उनके निसार।
बहुत उगे थे तब तक
उसने कुल अपने आंचल में
तोड़कर रखे अब तक।
घूमी प्यार से
मुसकराती देखकर बोली बहार से-
“देखो जी भरकर गुलाब
हम खायंगे कुकुरमुत्ते का कबाब।”
कुकुरमुत्ते की कहानी
सुनी उससे जीभ में बहार की आया पानी।
पूछा “क्या इसका कबाब
होगा ऎसा भी लजीज?
जितनी भाजियां दुनिया में
इसके सामने नाचीज?”
गोली बोली-”जैसी खुशबू
इसका वैसा ही स्वाद,
खाते खाते हर एक को
आ जाती है बिहिश्त की याद
सच समझ लो, इसका कलिया
तेल का भूना कबाब,
भाजियों में वैसा
जैसा आदमियों मे नव्वाब”  

 

निराला स्वच्छंता से परिपूर्ण क्रोधी स्वभाव के थे...

निराला स्वच्छंता से परिपूर्ण क्रोधी स्वभाव के थे। उनकी काव्य चेतना भी इससे अलग नहीं है। 'तोड़ती पत्थर और राम की शक्तिपूजा' में  निराला की ऊर्जा उर्ध्वगामिनी हुई है। क्रोध इसकी मूल चेतना में है।
 
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