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पीयूष मिश्रा से एक मुलाक़ात: दर्द की बारिशों में हम अकेले ही थे...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  'दर्द की बारिशों में हम अकेले ही थे 
जब बरसी खुशियां, न जाने भीड़ कहां से आ गई'

इंसान खुद की नज़र में सही होना चाहिए,
दुनिया तो भगवान से भी दुखी है।

इन चंद शब्दों में अपनी जिंदगी के दर्द को घोलने वाले बेजोड़ गीतकार पीयूष मिश्रा इन दिनों फिल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं...फोन उठाते ही कहते हैं...मैं इंटरव्यू नहीं देता क्योंकि मेरे पास कहने को कुछ होता नहीं है। मैं बोर भी बड़ी जल्दी हो जाता हूं। वैसे अब आप शेर-ओ- शायरी और कविताओं की बात कर रही हैं तो मैं आपसे बात कर लेता हूं।

अमर उजाला काव्य के साथ बातचीत में सबसे पहले पीयूष मिश्रा ने कविता के पैदा होने की वजह को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, 'मैं आपको बताना चाहता हूं कि कविताएं लिखना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। आप जिंदगी को कैसे जीते हैं और अपनी बात को कैसे कहते हैं और लिखते हैं वही कविता बन जाता है।'

वह आगे कहते हैं कि मेरे लिए कविता लिखना मौज-मस्ती ही है। मैं चांदनी चौक से गुज़रते हुए जब मजदूर को देखता हूं तो सिर्फ उस मजदूर को और उसकी मजदूरी की व्यथा को सोचता हूं। आम लोग उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। अब आप खुद उस मजदूर की व्यथा को देखिए और लिखने की कोशिश कीजिए। आप शायद जो शब्द पिरोएं वो बहुत अच्छे हों।

मैं कभी भी सोच कर लिखने नहीं बैठता। मेरे हाथ मे कलम हो, मैं बैठा हूं तो कविता अपने आप गुनती (बनती) जाती है। मैं  लिखता जाता हूं। पांच साल की बच्ची के साथ रेप हो रहा है। आपने मेरी "हुस्ना" सुनी वह खूब पॉपुलर हुई, क्या मैंने उसमें कुछ इस दुनिया से अलग लिखा है? नहीं...वो सारे शब्द ...वो लहजा सब आम बोल-चाल की भाषा है। आप भी बोलती हैं उन शब्दो को, मैंने बस उसे अलग अंदाज़ में पिरोया है।

 
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युवा गालियों से बात करता है...मैं कविताओं में कई कई बार उनके दिल की बात कर देता हूं

पीयूष मिश्रा PC: पोस्टपिकल

पीयूष ने बताया कि मुझे शेर और शायरी कहने का अंदाज़ नहीं आता है। मैं सच कहूं तो उस अंदाज़ से वाक़िफ भी नहीं हूं। मैं तो अपने अंदाज़ गढ़ता हूं और उसी में लिखता-गाता हूं और अपनी बात कहता हूं। वही बातें युवाओं को पसंद आती हैं। क्योंकि वो सारी बातें इस युवा मन की बात होती हैं। युवा गालियों से बात करता है। मैं कविताओं में कई कई बार उनके दिल की बात कर देता हूं। युवा झूमते हैं और मुझे अपने करीब पाते हैं।

मैं कोई पारंपरिक शायर या कविता लिखने वाला नहीं हूं। मैं अपने 25-30 साल के करियर में एक या दो बार ही मुशायरे में या ऐसी किसी जगह गया हूं, जहां लोग बड़े अंदाज़ में शायरी पढ़ते हैं। मेरी कविताएं जिंदगी से जुड़ी हैं। अब अगर मैं अपनी पिछले साल रिलीज़ हुई किताब की बात करूं तो "कुछ इश्क किया कुछ काम किया"  वो मेरे बीते दिनों की याद करते हुए लिखी गई। कविताओं से हर युवा खुद को जोड़ लेता है। ये कविताएं मेरी जिंदगी से ही नहीं जुड़ी हैं बल्कि इससे हर शख्स जुड़ जाता है जो निराश है, जो जिंदगी की जंग हार रहा है, जो खुद को खत्म कर देना चाहता है।

पीयूष ने बातचीत की शुरुआत में कहा था कि वो बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं लेकिन जब बातें शुरू हुईं तो दूर तक गईं। बातों-बातों में पीयूष ने बताया कि वो एक थियेटर आर्टिस्ट हैं। उन्होंने कहा, मैं थियेटर को जीता हूं, इसी के लिए घर से भी भागा। मैं जब घर से निकला तो नहीं जानता था कि कहां जाउंगा? जिंदगी में नहीं पता था कि क्या करना है? लेकिन मैं गढ़ता गया और कविताएं बनती गईं। हां, ये जरूर है कि मैं हमेशा से अलग करना चाहता था। और शायद यही वजह है कि मेरी थियेटर की म्यूजिकल जर्नी ने मुझे बदल कर रख दिया । 
 

पीयूष मिश्रा PC: डीएनए

पीयूष बातचीत के इस दौर में चंद लाइनें भी सुनाते हैं। 

"दायरा हर बार बनाता हूं ज़िन्दगी के लिए, लकीर वही रहती है…मैं खिसक जाता हूं।"
"रातों को चलती रहती है मोबाइल पे उंगलिया, सीने पे किताब रख के सोये काफी वक़्त हो गया।"
"न जाने कब खर्च हो गए, पता ही नहीं चला, वो लम्हे जो छुपा कर रखे थे जीने के लिए।
"कल तक उड़ती थी जो मुंह तक, आज पैरों से लिपट गई…चंद बुंदे क्या बरसी बरसात की, धूल की फ़ितरत ही बदल गई ।
""हल्की फुल्की सी हैं जिंदगी, बोझ तो ख्वाहिशों का हैं।" 
"अभी अभी कुछ गुज़ारा है, लापरवाह, धुल में दौड़ता हुआ, ज़रा पलट के देखूं तो, बचपन था शायद।

और अंत में वह कहते हैं चलिए, 'अब मैं चला प्रोड्यूसर मेरा बुला रहा है'।

पीयूष मिश्रा को जानिए  

पीयूष मिश्रा बॉलीवुड और रंगमंच की दुनिया का एक जाना माना नाम हैं। 13 जनवरी 1963 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्में पीयूष एक बेहतर नाटक अभिनेता, संगीत निर्देशक, गायक, गीतकार, और मंझे हुए पटकथा लेखक हैं। इनका बचपन ग्वालियर में बीता। 1986 में दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। पीयूष मिश्रा ने मकबूल, गुलाल, गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फ़िल्मों में गीत लिखे। पीयूष भगतसिंह पर आधारित नाटक 'गगन डमामा बाज्यो' से रंगमंच में प्रतिष्ठित हुए। मकबूल, गैंग्स ऑफ वासेपुर, शौकीन में अभिनय ने उन्हें पहचान दी। ब्लैक फ्राईडे ने उन्हें एक गीतकार और गायक के रूप में स्थापित कर दिया। इस फिल्म में उनका 'अरे रुक जा रे बंदे' गीत बहुत चर्चित हुआ।

गुलाल फिल्म के गीत 'आरंभ है प्रचंड है' ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। दिल पे मत ले यार, आजा नच ले और टशन जैसी फिल्मों में भी उन्होंने लोकप्रिय गीत लिखे। 'मेरे मंच की सरगम' किताब में पीयूष के करीब 125 नए गीत संकलित किए गए हैं। पीयूष गीत लिखने का मापदंड बदलते हैं। मन को अजीब सी सिरहन देते हैं। शायद शब्दों को ठहराव देना पीयूष को पसंद नहीं। वह इसमें हमेशा उत्ताल तरंगों की ध्वनि चाहते हैं। इनके गीतों में मन को कंपित करते रहने की विशेषता है। पीयूष ने 'गैंग ऑफ वासेपुर' में एक यथार्थपरक गीत लिखा है। फ़िल्म 'गुलाल' के गीत भी पीयूष मिश्रा ने लिखे हैं। यह गीत भी मन को लुभाने वाला है। 
वैसे अगर आपने पीयूष का हुस्ना नहीं सुना है तो आपने कुछ नहीं सुना..
मैं तो हूं बैठा वो हुस्ना मेरी.. यादों पुरानी में खोया...पल पल को गिनता पल पल को चुनता बीती कहानी में खोया...कोक स्टूडियो में गाए इस गीत ने पीयूष को हर दिल अजीज बना दिया...वो युवाओं की पहली पसंद बने और बने हुए हैं..और बने रहेंगे।

आप यहां हुस्ना गीत को देख और सुन सकते हैं...

9 वर्ष पहले
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