हिंदी साहित्य में खड़ी बोली की शुरुआत करने वाले कवि मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' की उपमा दी थी। उन्हें पद्मभूषण सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है। उनकी जयंती को कवि दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। पढ़ें राष्ट्रकवि की लिखी कविताओं से कुछ विशेष पंक्तियां
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को
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चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से
मृषा मृत्यु का भय है
जीवन की ही जय है ।
जीव की जड़ जमा रहा है
नित नव वैभव कमा रहा है
यह आत्मा अक्षय है
जीवन की ही जय है।
नया जन्म ही जग पाता है
मरण मूढ़-सा रह जाता है
एक बीज सौ उपजाता है
सृष्टा बड़ा सदय है
जीवन की ही जय है
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये
नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे