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इस सदी का गीत हूँ मैं गुनगुनाकर देखिए...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हिंदी गीत के प्रतिष्ठित समवेत संकलन ‘पाँच जोड़ बांसुरी’ के संपादक डा. चन्द्रदेव सिंह ने कहा है कि ‘आज का गीत न तो लोक जीवन से विमुख है और न ही नागरिक जीवन से उपेक्षित, न तो राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं से बद्ध है और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों से तटस्थ।  नया गीतकार अपने परिवेश के प्रति सजग तथा अस्तित्व के प्रति व्यापक रूप से सतर्क है। वर्तमान में हिंदी गीतों की संवेदना जन-जन के मर्म को छूती है। इनमें निजता भी है और लोक जीवन भी, युग चेतना है पर दिखावटी बौद्धिकता नहीं।’ 

आज के जिस गीत की बात डा. चन्द्रदेव सिंह ने की है वह नवगीत ही तो है जिसमें समसामयिक संदर्भ भी हैं और जीवन-मूल्य भी। अपने जन्म से लेकर आज तक की नवगीत की यात्रा में अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव आए और अनेक रचनाकार हुए जिन्होंने अपने रचनाकाल में अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से नवगीत के क्षेत्र में नये-नये कीर्तिमान स्थापित किए।

महाकवि निराला से आरंभ हुई नवगीत की यह सात्विक यात्रा आज भी अनवरत चल रही है, इस यात्रा में नवगीत को उत्तरोत्तर समृद्ध करने वाले महत्वपूर्ण नवगीत-साधकों में वीरेन्द्र मिश्र, उमाकांत मालवीय, शलभ श्रीराम सिंह, शंभूनाथ सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, गुलाब सिंह, विद्यानंदन राजीव, कैलाश गौतम, नईम, नचिकेता, कुमार रवीन्द्र, डा. शान्ति सुमन, मधुकर अष्ठाना, वीरेन्द्र ‘आस्तिक’, अबधविहारी श्रीवास्तव सहित अनेक प्रमुख रचनाकार रहे हैं जिन्होंने नवगीत की रचनाधर्मिता को उजली दिशा प्रदान करने के साथ-साथ उसे नया स्वरूप भी दिया और भाषाई सहजता भी। 
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हिन्दी नवगीत विधा के बरहम बाबा

इसी भाषाई सहजता और आंचलिक मिठास की चर्चा हिन्दी साहित्य में जब-जब नवगीत की संवेदना और युगीन संदर्भों के साथ होती है, हिन्दी नवगीत के महत्वपूर्ण और अद्भुत हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी के सृजनात्मक उल्लेख के बिना न तो वह पूर्ण होती है और ना ही उस चर्चा का कोई महत्व रहता है। 

इसे सुप्रसिद्ध गीतकवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र के शब्दों में कहा जाये तो अधिक उचित होगा-‘माहेश्वर तिवारी हिन्दी नवगीत विधा के बरहम बाबा हैं। जैसे गांव का कोई शुभकार्य बरहम बाबा की प्रदक्षिणा किए बिना आरंभ नहीं किया जाता, ठीक उसी तरह हिन्दी नवगीत की चर्चा भी माहेश्वर तिवारी के बिना पूरी नहीं हो सकती है।’ 

उ. प्र. के बस्ती जनपद में जन्मे तथा वर्तमान में मुरादाबाद के साहित्यिक पर्याय माहेश्वर तिवारी का सृजन-संसार अपने समकालीन परिवेश एवं लोक मानस से निरंतर जुड़ा रहता है, यही कारण है कि उनकी रचनाओं में प्रयुक्त आंचलिक शब्द, मुहावरे और जीवन-जगत से जुड़े अनूठे प्रयोग उन्हें अन्य नवगीतकारों में एक अलग विशेष पहचान दिलाते हैं।

बर्फ होकर जी रहे हम तुम

उनके नवगीत अपनी विशेष रचना-दृष्टि, अछूते बिंबों और स्वस्थ कथ्य के चलते पाठकों और श्रोताओं के मन को भीतर तक छूते भी हैं और मन-मस्तिष्क पर छाते भी हैं। 

उनके नवगीतों में भारतीयता की सांस्कृतिक सुगंध अपने समय के युगबोध और मूल्यबोध के साथ उपस्थित है, कथ्य और शिल्प में प्रयोगवादी स्वर है तो नवता के साथ।

 उन्होंने अपने नवगीतों में वर्तमान परिवेश के लगभग हर पहलू को सार्थक अभिव्यक्ति दी है, चाहे राजनीति का विद्रूप चेह्रा हो, व्यवस्थाओं की अव्यवस्थित स्थिति हो, आम-आदमी की विवशताओं का चित्रण हो या फिर सामाजिक विषमताएं हों-

‘बर्फ होकर
जी रहे हम तुम
मोम की जलती इमारत में
इस तरह
वातावरण कुहरिल
धूप होना
हो रहा मुश्किल
जूझने को
हम अकेले हैं
एक अंधे महाभारत में’

सुन रहा हूँ शेर की खालें दिखाकर

नवगीत ने हमेशा अपने समय के अधुनातन संदर्भों के यथार्थ को मुक्तछंद की कविताओं के समांतर ही उजागर किया है। कविता में यथार्थ का अर्थ सपाटबयानी या समाचार-वाचन नहीं होता, सच्ची कविता में यथार्थ की उपस्थिति भी अपनी संवेदनशीलता और काव्यत्व की ख़ुशबू के साथ होती है।

माहेश्वर तिवारी के नवगीतों में यथार्थ का चित्रण इसी काव्यत्व की ख़ूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया गया है। यह आम धारणा के साथ-साथ कड़वी सच्चाई भी है कि आज के समय में राजनीति के क्षेत्र में वही व्यक्ति सफल है या हो सकता है जो छल-छंद, मक्कारी, दबंगई और अनैतिक चातुर्य में निपुण हो। राजनीति के ऐसे ही विद्रूप पक्ष को अपनी पंक्तियों में माहेश्वर तिवारी प्रभावी रूप से व्यक्त करते हुए मंथन करने पर विवश करते हैं-

‘सुन रहा हूँ
शेर की खालें दिखाकर
मेमने कुछ फिर किसी
मुठभेड़ में मारे गए
फिर हवा ने
मुखबिरी की चंद फूलों की
और बन आई
खड़े काले बबूलों की
कई कागज लिए बादामी
गाँव को जब
चंद हरकारे गए’

आने वाले हैं ऐसे दिन आने वाले हैं

एक अन्य नवगीत में भी माहेश्वर तिवारी अपने मन की इन्हीं पीड़ाओं को प्रतीकों के माध्यम से बहुत ही प्रभावशाली रूप से अभिव्यक्त करते हुए साम्राज्यवादी नीतियों के ख़तरों के प्रति आगाह करते हैं-

‘आने वाले हैं
ऐसे दिन आने वाले हैं
जो आँसू पर भी
पहरे बैठाने वाले हैं
आकर आसपास भर देंगे
ऐसी चिल्लाहट
सुन न सकेंगे हम अपने ही
भीतर की आहट
शोर-शराबे ऐसा
दिल दहलाने वाले हैं’


आज तथाकथित कुछ सुख-सुविधाओं की तलाश में आदमी का वास्तविक सुख-चैन ख़त्म हो गया है। कभी किसी कारण से तो कभी किसी कारण से दिन-रात तनावग्रस्त रहना और चिन्ताओं की भट्टी में पल-पल गलते रहना उसकी नियति बन गई है। 

चिट्ठियां भिजवा रहा है गाँव

महानगरीय जीवन में व्याप्त इन्हीं विद्रूपताओं और विसंगतियों से व्यथित माहेश तिवारी गांव वापस लौटने की आत्मीयता से लबालब गुहार लगाते हैं क्योंकि कवि को लगता है कि शहर की तुलना में गांव का जीवन अधिक सरल और सुकून भरा है-

‘चिट्ठियां भिजवा रहा है गाँव
अब घर लौट आओ
थरथराती गंध
पहले बौर की कहने लगी है
याद माँ के हाथ
पहले कौर की कहने लगी है
थक चुके होंगे सफर में पाँव
अब घर लौट आओ’


माहेश्वर तिवारी हिन्दी नवगीत के एक समर्थ रचनाकार हैं। उनके रचना कर्म का कैनवास बहुत विस्तृत है, मुझे नहीं लगता कि उनकी लेखनी से कोई भी विषय छूटा हो। सामान्य सी बात है कि प्रेम का हर व्यक्ति से गहरा नाता होता है।

उन्होंने अपनी रचनाओं में जहां एक ओर अपने समय के यथार्थ को बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ महसूस करते हुए उकेरा है वहीं दूसरी ओर काग़ज के कोरेपन की तरह पवित्र प्रेम को भी मिठास की खुशबू भरे शब्द दिए हैं। 

प्रेमगीतों का भी अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है

हिन्दी गीति-काव्य में प्रेमगीतों का भी अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है, छायावादोत्तर काल में विशेष रूप से। माहेश्वर तिवारी के प्रेम की चाशनी में पगे गीतों में भी वही परंपरागत स्वर अपनी चुम्बकीय शक्ति के साथ विद्यमान है लेकिन नवता की मिठास के साथ-

‘डायरी में 
उँगलियों के फूल से
लिख गया है
नाम कोई भूल से
सामने यह खुला पन्ना
दिख गया हो
कौन जाने आदतन ही
लिख गया हो
शब्द जो
सीखे कभी थे धूल से’


माहेश्वर तिवारी का एक गीत जो रचा तो गया सन् 1964 में लेकिन आज आधी सदी बीत जाने बाद भी उतना ही ताज़गी भरा लगता है जितना रचे जाने के समय होगा। यह गीत केवल चर्चित ही नहीं हुआ बल्कि उनकी पहचान का गीत भी बना-

‘याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे
लौट रही गायों के संग-संग
याद तुम्हारी आती
और धूल के संग-संग मेरे
माथे को छू जाती
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे’


हिन्दी के विख्यात गीतकवि स्व. भवानीप्रसाद मिश्र को यह गीत बहुत पसंद था, उन्होंने होशंगाबाद के एक कवि सम्मेलन में इस गीत की और गीत के रचयिता की आधे घंटे तक प्रशंसा की और यही गीत सुनाने का आग्रह किया। 

एक बार एक कविसम्मेलन में माहेश्वर तिवारी ने यही गीत सुनाया, कविसम्मेलन के पश्चात एक बुजुर्ग व्यक्ति माहेश्वर तिवारी के पास आए और बोले कि तिवारी जी जब किरन अकेली पर्वत पार कर रही थी तो आप उसके साथ नहीं थे क्या? उन बुजुर्ग की बात सुनकर तिवारी जी ठहाका लगाकर हँस पड़े।

पेड़ का गाना सुना है क्या ?

पंडित रमानाथ अवस्थी जी का प्रसिद्ध गीत है-‘मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं/जो भी तुमसे लग जाए लगा लेना’ मैं समझता हूँ कि अवस्थी जी की उपर्युक्त पंक्तियां माहेश्वर तिवारी के रचनाकर्म को संक्षेप में पूर्णतः व्याख्यायित करती हैं। नवगीतों के शिल्प, भाव, कथ्य और सन्दर्भ में वैविध्य ही उनकी पूँजी है। 

लगभग सभी विषयों सन्दर्भों को उनके नवगीत आत्मसात करते हुए श्रोताओं से, पाठकों से सीधा संवाद करते हैं। उनके नवगीत ज़मीन से जुड़कर तो बात करते ही हैं, हमें ऐसे दिवालोक में भी ले जाते हैं जहां ‘खिलखिलाते हैं/नदी में/जंगलों के गेह’, ‘दूर तक फैला हुआ तट/चाँदनी में सो गया है’, ‘डालों से उलझी है शाम/कनेरों वाली मुंडेरों पर’, ‘किसी स्वेटर की तरह/बुनकर/दिशाएं खुल गई हैं’, ‘मटर की ताज़ी फलियों से दिन’ और ‘कच्ची अमियां की फांकों-सी आँखें’ हैं। शायद ही किसी ने पत्तियों को ताली बजाते देखा हो,  माहेश्वर तिवारी के नवगीतों में पत्तियां भी ताली बजाती हैं- 

‘पेड़ का
गाना सुना है क्या
पत्तियां
ताली बजाती हैं
और
सुर में सुर मिलाती हैं
यह कभी
हमने गुना है क्या’

गीतों की मिठास में हम झूम-झूम जाते हैं

विख्यात साहित्यकार दयानन्द पाण्डेय के शब्दों में कहें ‘माहेश्वर तिवारी के गीतों की मिठास में हम झूम-झूम जाते हैं। फिर जब इन गीतों को माहेश्वर तिवारी का सुरीला कंठ भी मिल जाता है तो हम इन में डूब-डूब जाते हैं। इन गीतों की चांदनी में न्यौछावर हो-हो जाते हैं। माहेश्वर तिवारी हम में और माहेश्वर तिवारी में हम बहने लग जाते हैं। माहेश्वर तिवारी के गीतों की तासीर ही ऐसी है। करें तो क्या करें?’ स्वयं  तिवारी जी भी कहते हैं-

‘सिर्फ़ तिनके-सा न दाँतों में दबाकर देखिए
इस सदी का गीत हूँ मैं, गुनगुनाकर देखिए’


यश भारती सहित अनेकानेक सम्मानों से समादृत माहेश्वर तिवारी के रचना-संसार में नवगीतों के अनेकानेक बहुमूल्य रत्न हैं। उनके एक-एक नवगीत के संदर्भ में बात की जाए तो हर नवगीत पर एक आलेख तैयार हो सकता है। माहेश्वर तिवारी के रचनाकर्म के संदर्भ में कुछ भी लिख पाना विख्यात शायर स्व. कृष्ण बिहारी ‘नूर’ के इस शे’र जैसा ही है-

‘लब क्या बतायें कितनी अज़ीम उसकी जात है
 सागर को सीपियों से उलीचने की बात है’ 

~ योगेन्द्र वर्मा 'व्योम', मुरादाबाद

 
2 वर्ष पहले
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Ankit Kumar

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