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मां पर ये हैं 18 सबसे मशहूर शेर...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  मां जिंदगी का विश्वास होती है, मां जीवन का संबल होती है, मां जीवन का सराहा होती है, मां जीवन की आस होती है, मां जीवन का सार होती है। दुनिया में ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें मां का प्यार और आशीर्वाद नहीं मिल पाता है। ऐसे लोगों के लिए हम काव्य चर्चा के इस सेक्शन में मां पर कहे गए अब तक के 18 सबसे मशहूर शेर पेश कर रहे हैं। उम्मीद है ये शेर मां का मतलब समझाने में कामयाब होंगे...  

कल अपने-आप को देखा था माँ की आँखों में
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है
-मुनव्वर राना
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मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है...

एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई 'ताबिश'
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है 
-अब्बास ताबिश


वो लम्हा जब मेरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे
मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई
-हुमैरा रहमान

 

सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है...

मुझे मालूम है मां की दुआएं साथ चलती हैं, 
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है
-आलोक श्रीवास्तव 

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है
मैंने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है
-मुनव्वर राना

 

मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई...

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
-मुनव्वर राना

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बातें की बिन चिट्ठी बिन तार
-निदा फ़ाज़ली

चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा...

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा
-आलोक श्रीवास्तव 

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
-मुनव्वर राना

 

माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ...

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
-मुनव्वर राना

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती 
घर की कुंडी जैसी माँ 

बेसन की सोंधी रोटी पर 
खट्टी चटनी जैसी माँ 
-निदा फाजली 

हम गरीब थे, ये बस हमारी माँ जानती थी…

हालात बुरे थे मगर अमीर बनाकर रखती थी,
हम गरीब थे, ये बस हमारी माँ जानती थी…
-मुनव्वर राना


भारी बोझ पहाड़ सा कुछ हल्का हो जाए
जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए
-अख़्तर नज़्मी

 

उसके प्यार की दास्तान इतनी लंबी थी...

स्याही खत्म हो गयी “माँ” लिखते-लिखते
उसके प्यार की दास्तान इतनी लंबी थी

न जाने क्यों आज अपना ही घर मुझे अनजान सा लगता है,
तेरे जाने के बाद ये घर-घर नहीं खली मकान सा लगता है

पर और बच्चों में रोटी अपने हिस्से की बाँट देती है...

गम हो, दुःख हो या खुशियाँ
माँ जीवन के हर किस्से में साथ देती है,
खुद सो जाती है भूखी
पर और बच्चों में रोटी अपने हिस्से की बाँट देती है


एक दुनिया है जो समझाने से भी नहीं समझती,
एक माँ थी बिन बोले सब समझ जाती थी

 

मांगने पर जहाँ पूरी हर मन्नत होती है...

मांगने पर जहाँ पूरी हर मन्नत होती है,
माँ के पैरों में ही तो वो जन्नत होती है

साभार-कविता कोश 

 
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