समीर अनजान बॉलीवुड के बड़े गीतकारों में से एक हैं और उनके नाम सबसे ज़्यादा गाने लिखने का रिकॉर्ड भी दर्ज है लेकिन जितने स्पर्शी उनके गीत हैं, उतनी ही सरलता से उन्होंने अपनी नज़्मों को भी लिखा है। उनके संग्रह में से पेश हैं ये ख़ूबसूरत नज़्में-
तुम्हें देखकर सोचता हूं मैं अक्सर
कि मेरे ख़यालों की मंज़िल तुम ही हो
धड़कता है सीने में वो दिल तुम ही हो
जिसे दस्ते-कुदरत ने पल-पल संवारा
तुम्हें उस मोहब्ब्त की मूरत कहूं मैं
तुम्हें देखकर सोचता हूं मैं अक्सर
सितारों में शायद तुम्हारी झलक है,
तुम ही से ज़मीं है तुम ही से फ़लक है
जिसे ढूंढ़ता हूं मैं रोज़े-अज़ल से
उसी जुस्तजू का नशा आज तक है
तुम्हें देखकर सोचता हूं मैं अक्सर
मेरी ज़िंदगी की हसीं वादियों में
घटाओं की सूरत बरस जाओ एक दिन
तुम्हें देख के भी ना देखे ज़माना
मेरी धड़कनों में यूं बस जाओ एक दिन
तुम्हें देखकर सोचता हूं मैं अक्सर
यही है तमन्ना यही आरज़ू है
तुम्हारी अदाओं के झूलों में झूलूं
बचाओ भले लाख दामन तुम मुझसे
हवा बनके मैं सुर्ख़ होठों को छू लूं
तुम्हें देखकर सोचता हूं मैं अक्सर
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मेरी चाय की प्याली में, सुबह की हल्की लाली में
मेरे दिन में दोपहर में, शामो-रात हर पहर में,
मेरी दुआ में, ख़्यालों में
मेरे जवाबों में, सवालों में
तुम और तुम्हारी याद है।
मेरे मोबाइल फ़ोन में, एसएमएस रिंगटोन में
कमरे की तनहाई में, ख़्वाबों की परछाईं में
तुम और तुम्हारी याद है।
मेरी दीवानगी के आलम में, मेरी आवारगी के मौसम में
भीड़ में, अकेले में, यादों के मेले में, तुम और तुम्हारी याद है
मेरे तकिये में, चादर में, मेरी सलवटों में, बिस्तर में,
तुम और तुम्हारी याद है।
मेरी नींद में. इंतज़ार में, मेरी बेचैनी में, करार में
मेरी तड़प में, बयान में, गली में, मकान में,
तुम और तुम्हारी याद है।
साभार- दास्तां कहते-कहते
वाणी प्रकाशन