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जीवन दर्शन के चुनिंदा शेर...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  रूप की धूप कहाँ जाती है मालूम नहीं 
शाम किस तरह उतर आती है रुख़्सारों पर 
- इरफ़ान सिद्दीक़ी

अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ 
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ 
- मुसव्विर सब्ज़वारी

ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि 'फ़राज़' 
रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़ 
- अहमद फ़राज़
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बुतों को पूजने वालों को क्यूँ इल्ज़ाम देते हो 
डरो उस से कि जिस ने उन को इस क़ाबिल बनाया है 
- मख़मूर सईदी

जाने कितने लोग शामिल थे मिरी तख़्लीक़ में 
मैं तो बस अल्फ़ाज़ में था शाएरी में कौन था 
- भारत भूषण पन्त

मैं भी यहाँ हूँ इस की शहादत में किस को लाऊँ 
मुश्किल ये है कि आप हूँ अपनी नज़ीर मैं 
- फ़रहत एहसास

किसी के काम न आये तो आदमी क्या है? 
जो अपनी फ़िक्र में गुज़रे वो ज़िंदगी क्या है? 
-असर लखनवी 

इंसान हो किसी भी सदी का कहीं का हो 
ये जब उठा ज़मीर की आवाज़ से उठा 
-उबैदुल्लाह अलीम

जो दर्द मे वाकिफ़ हैं वो ख़ूब समझते हैं 
राहत में तुझे खोया तकलीफ़ में पाया है
-असर लखनवी 

करते फिरते हो अँधेरे की शिकायत 'दर्शन'
दिल की दुनिया में कोई दीप जलाओ तो सही
- दर्शन सिंह

आपका मक़सद पुराना है मगर ख़ंजर नया 
मेरी मजबूरी है यह, लाऊं कहां से सर नया 
-कृष्णानंद चौबे

लाख बेजान सही उसका भी मन दुखता है 
खून नाहक हो तो ख़ंजर का बदन दुखता है 
-'पारस' बहराइची 

हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर 
मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख 
-मोहम्मद अल्वी

तिरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं 
तिरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है 
-अभिषेक शुक्ला
6 वर्ष पहले
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