रूप की धूप कहाँ जाती है मालूम नहीं
शाम किस तरह उतर आती है रुख़्सारों पर
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
- मुसव्विर सब्ज़वारी
ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि 'फ़राज़'
रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़
- अहमद फ़राज़
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बुतों को पूजने वालों को क्यूँ इल्ज़ाम देते हो
डरो उस से कि जिस ने उन को इस क़ाबिल बनाया है
- मख़मूर सईदी
जाने कितने लोग शामिल थे मिरी तख़्लीक़ में
मैं तो बस अल्फ़ाज़ में था शाएरी में कौन था
- भारत भूषण पन्त
मैं भी यहाँ हूँ इस की शहादत में किस को लाऊँ
मुश्किल ये है कि आप हूँ अपनी नज़ीर मैं
- फ़रहत एहसास
किसी के काम न आये तो आदमी क्या है?
जो अपनी फ़िक्र में गुज़रे वो ज़िंदगी क्या है?
-असर लखनवी
इंसान हो किसी भी सदी का कहीं का हो
ये जब उठा ज़मीर की आवाज़ से उठा
-उबैदुल्लाह अलीम
जो दर्द मे वाकिफ़ हैं वो ख़ूब समझते हैं
राहत में तुझे खोया तकलीफ़ में पाया है
-असर लखनवी
करते फिरते हो अँधेरे की शिकायत 'दर्शन'
दिल की दुनिया में कोई दीप जलाओ तो सही
- दर्शन सिंह
आपका मक़सद पुराना है मगर ख़ंजर नया
मेरी मजबूरी है यह, लाऊं कहां से सर नया
-कृष्णानंद चौबे
लाख बेजान सही उसका भी मन दुखता है
खून नाहक हो तो ख़ंजर का बदन दुखता है
-'पारस' बहराइची
हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर
मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख
-मोहम्मद अल्वी
तिरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं
तिरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है
-अभिषेक शुक्ला