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शाद अज़ीमाबादी के चुनिंदा 20 शेर...

शरद मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  शाद अज़ीमाबादी ने भी अन्य शायरों की तरह अपनी शायरी में इश्क़ और उसमें मिलने वाले धोखे के बाद आने वाली तन्हाई का बखूबी ढंग से वर्णन किया है । उनके ये लोकप्रिय 20 शेर आपको जिंदगी में खुद्दारी और टकराव की कश्मकश भरी तस्वीर दिखलाएंगे ।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया...

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया 
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया

दिल-ए-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनक़-ए-बज़्म 
मैं ख़ुद आया नहीं लाया गया हूँ 

ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है... 

ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है 
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है 

जैसे मिरी निगाह ने देखा न हो कभी 
महसूस ये हुआ तुझे हर बार देख कर 

खिलौने दे के बहलाया गया हूँ... 

तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ 
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ 

कौन सी बात नई ऐ दिल-ए-नाकाम हुई 
शाम से सुब्ह हुई सुब्ह से फिर शाम हुई 

किस ग़ज़ब का दर्द ज़ालिम तेरे अफ़्साने में था... 

ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम 
जो याद न आए भूल के फिर ऐ हम-नफ़सो वो ख़्वाब हैं हम 


सुन चुके जब हाल मेरा ले के अंगड़ाई कहा 
किस ग़ज़ब का दर्द ज़ालिम तेरे अफ़्साने में था 

तेवर तुम्हारे देख के ख़ामोश हो गया... 


कहाँ से लाऊँ सब्र-ए-हज़रत-ए-अय्यूब ऐ साक़ी 
ख़ुम आएगा सुराही आएगी तब जाम आएगा 


इज़हार-ए-मुद्दआ का इरादा था आज कुछ 
तेवर तुम्हारे देख के ख़ामोश हो गया 

जब किसी ने हाल पूछा रो दिया... 

निगाह-ए-नाज़ से साक़ी का देखना मुझ को 
मिरा वो हाथ में साग़र उठा के रह जाना 


जब किसी ने हाल पूछा रो दिया 
चश्म-ए-तर तू ने तो मुझ को खो दिया 

गुज़री है रात शम्अ पे क्या देखते चलें... 

मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़ 
सारा समुंदर इक तरफ़ आँसू का क़तरा इक तरफ़ 


परवानों का तो हश्र जो होना था हो चुका 
गुज़री है रात शम्अ पे क्या देखते चलें 

कुछ वही अच्छे हैं जो वाक़िफ़ नहीं अंजाम से...

मैं हैरत ओ हसरत का मारा ख़ामोश खड़ा हूँ साहिल पर 
दरिया-ए-मोहब्बत कहता है आ कुछ भी नहीं पायाब हैं हम 

जीते जी हम तो ग़म-ए-फ़र्दा की धुन में मर गए 
कुछ वही अच्छे हैं जो वाक़िफ़ नहीं अंजाम से

सितम देखो कि वो भी छूटते पहचान लेते हैं... 

एक सितम और लाख अदाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने 
तिरछी निगाहें तंग क़बाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने  


जो तंग आ कर किसी दिन दिल पे हम कुछ ठान लेते हैं 
सितम देखो कि वो भी छूटते पहचान लेते हैं 

अपना करो ख़याल हमारी तो कट गई... 

ग़ुंचों के मुस्कुराने पे कहते हैं हँस के फूल 
अपना करो ख़याल हमारी तो कट गई 

नज़र की बर्छियाँ जो सह सके सीना उसी का है 
हमारा आप का जीना नहीं जीना उसी का है 
5 वर्ष पहले
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