अनुगूंज साहित्यिक संस्था ने अपने ऑनलाइन फेसबुक पटल पर "एक मुलाकात " कार्यक्रम के अतंर्गत हास्यरस सम्राट कवि पद्मश्री सुरेन्द्र शर्मा जी को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया। आधे घंटे की बातचीत में अनुगूंज की संस्थापक निवेदिता चक्रवर्ती ने सुरेन्द्र शर्मा से उनके व्यक्तिगत जीवन, भारत की विभिन्न भाषाओं, हास्य रस की आड़ में फूहड़ हास्य, लाॅकडाऊन के दौरान परिवार की बदलती स्थिति इत्यादि के बारे में प्रश्न किए। जीवन के कई प्रतिमानों को स्पर्श करता हुआ यह साक्षात्कार नदी सा प्रवाहित हो रहा था।
प्रश्न और उत्तरों के बीच मानव मन की प्रसन्नता, उमंग, दुःख, समाज और देश के लिए चिंतन, संबंधों की गहनता, मित्रता का महत्त्व सब एक -एक कर उतर रहे थे। सुरेंद्र शर्मा ने अपने विनम्र व्यक्तित्व का परिचय देते हुए कहा, "मैं आज भी अपने आपको कवि नहीं मान पाया, मैं प्रसिद्ध हुआ हूँ, सिद्ध नहीं, कविता के क्षेत्र में आप कितना भी कर लें, बहुत कुछ अनकहा, अनलिखा रह जाता है ।”
मनुष्य कैसे अपने जीवन में संतुष्टि भाव से लगातार असंतुष्टि के भाव की ओर अग्रसर है, अपने एक प्रश्न के उत्तर में सुरेंद्र शर्मा ने इंगित किया। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने अपने बचपन के दोस्तों और अपने माता -पिता को भी याद किया।
निवेदिता चक्रवर्ती अपने प्रश्नों से सुरेंद्र शर्मा को उनके अतीत की स्मृतियों में ले गईं। सुरेंद्र शर्मा ने सुंदर जीवन दर्शन दिया, "दुःख हमारे व्यक्तिगत होने चाहिए और सुख सार्वजनिक होने चाहिए।" उन्होंने लॉकडाउन के समय लिए गए निर्णयों पर अपनी भावना जताते हुए कहा," सोशल डिस्टैन्सिंग, नहीं फिजिकल डिस्टैन्सिंग होनी चाहिए थी, पर फिजिकल डिस्टैन्सिंग को भी भारतीयता की दृष्टि से किसी ने नहीं देखा। "
एक प्रश्न के उत्तर में सुरेंद्र शर्मा ने बड़ी संजीदगी से कहा- “सौ कविताएं आँसुओं पर मत लिखो, एक के आँसू पोंछ दो तो वो सौ पर भारी हो जाता है। " एक और प्रश्न के उत्तर में हास और उपहास में अंतर को समझाया। अपनी हँसी के कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा ," हमारा यान मंगल पर पहुंचे,वो मेरे लिए हँसी की बात होगी, जब देश उपलब्धि करेगा, वो मेरे लिए हँसी की बात होगी, जब हम कोरोना की वैक्सीन लाएंगे,वो मेरे लिए हँसी की बात होगी……”
अंत में उन्होंने तीन मुक्तक और देश के लिए एक कविता सुनाई।
6 वर्ष पहले