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जयंती विशेष: कबीर का उद्देश्य था जन्म-मरण से मुक्त होना...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  कबीर सामाजिक और आर्थिक विषमता के काल में पैदा हुए थे। उनका जन्म 1338 में काशी के पास लहरतारा नामक तलाब के पास हुआ। निधन मगहर में 1518 में हुआ था। उस समय का धार्मिक जीवन पूर्णतः ब्राह्चारों एवं बामाचारों की गिरफ्त में था। व्यक्ति मोह या निर्वाण की चिंता में लगे रहने के कारण अपना सामजिक संदर्भ खो चुका था। कबीर का लक्ष्य ही था जन्म और मरण से मुक्त होना। इनके काल में राजनीति और अर्थ की प्रधानता उस समय तक स्थापित नहीं हुई थी। यदि कहीं राजनीति थी भी तो धार्मिक राजनीति थी। उस समय के समाज में जितनी विषमताओं के ऊँच-नीच के दर्शन होते हैं, वे उस समय के धर्म द्वारा ही प्रेरित है।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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‘धर्म’ शब्द का पहले चाहे...

‘धर्म’ शब्द का पहले चाहे जो भी अर्थ रहा हो कबीर के जमाने में उसका स्वरुप साम्प्रदायिक हो गया था। इनके समय की पूरी सामाजिक व्यवस्था अन्तविरोधों और रूढि़यों से जर्जरित होकर दिशाहीन हो गयी थी। कबीर इन्हीं परिस्थितियों के बीच उत्पन्न हुए थे। इसलिए उन्होंने अंधविश्वासों, रुढि़यों एवं साामजिक विषमताओं के विरोध में तूफानी अभियान चलाया था। इसी विधा पर कुछ विद्वान उन्हें समाज सुधारक, कुछ सर्वधर्म समन्वयकारी, कुछ हिन्दू-मुसलमान एकता के प्रचारक सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। परंतु कबीर को हिन्दू-मुस्लिम एकता या सर्वधर्म समन्वय की वकालत करने वाले धार्मिक नेता के रुप में दिखाना उनके प्रति अन्याय करना होगा।

कबीर की रचनाएं समाज सुधार की प्रेरणा देती हैं...

कबीर की रचनाएं समाज सुधार की प्रेरणा देती हैं, उनमें सर्वधर्म समन्वय का मूल मंत्र दिया है, बावजूद इसके कबीर न तो उस अर्थ में समाज सुधारक थे और न ही सर्वधर्म समन्वयकारी, जिन अर्थों में लोग उन्हें इन कटघरों में बैठाना चाहते हैं। किन्तु आज सर्वधर्म समन्वय का जो अर्थ लिया जाता है, वह कबीर में एकदम नहीं था। सभी धर्मों के बाह्याचारों और संस्कारों में कुछ न कुछ विशेष या समान देखना और सब आचारों-संस्कारों को सम्मान की दृष्टि से देखना ही सर्वधर्म समन्वय का भाव है। कबीर इस भाव के प्रबल विरोधी थे। निरर्थक आचार एवं रुढि़यों से उन्हें बेहद चिंता थी, चाहे वे किसी अवतारी पुरुष या पैगम्बर द्वारा ही प्रवर्तित क्यों न हो। कबीर अपनी राह पर चलते थे। उनकी राह न हिन्दू की थी न मुसलमान की।
 

कबीर मूलतः साधक थे...

कबीर मूलतः साधक थे, डॉ ताराचंद ने कबीर को मध्यमार्गी कहा है ‘‘कबीर ने ऐसे धर्म का उपदेश दिया जो सभी जातियों और वर्णों में प्रेम और एकता का प्रसार कर सके। उन्होंने दोनों धर्मों के मध्य विभाजकता को त्यागकर मध्यमार्ग की शिक्षा दी थी।’’ कबीर पर मध्यमार्ग का लेबल लगाना भी उचित नहीं है। मध्यमार्ग दो विरोधों के बीच का रास्ता है। यह समझौते का उपाय है। यह उपाय चिरस्थायी नहीं रहता। समय बीतने पर दोनों में दबी घृणा सतह पर आकर टकराव में बदल जाती है। इससे अलग कबीर तो घृणा एवं टकराव के कारण को ही समाप्त कर देना चाहते थे। वे ऐसे समाज के परिकल्पक थे जिसमें मानव निर्मित सारे भेदभाव नष्ट हो जाएँ और आम आदमी स्वाभिमान की जिंदगी जी सके।
 

कबीर ने सम्प्रदायवाद एवं जाति भेद...

कबीर ब्रह्म के स्वरुप को सम्प्रदाय के चौखट में रखकर नहीं देखते। स्थूल भेदों के चक्कर में सार की प्राप्ति नहीं होगी। कबीर ने सम्प्रदायवाद एवं जाति भेद के विभाजन को जड़ से समाप्त करने के लिए ही एक ईश्वर की अवधारणा पर बल दिया था। इसी क्रम में वे प्रेम का मार्ग अपनाते हैं। उनके अनुसार ब्रह्म प्रेम और अटूट विश्वास से ही प्राप्त किया जा सकता है। घृणा मनुष्यों को बाँटती है, यही काम भिन्न-भिन्न उपासना पद्धतियाँ भी करती हैं, पर प्रेम हर प्रकार के भेद के विरूद्ध है इसी प्रेम के जरिये ही हिन्दू-मुसलमान या अन्य धर्मों को मानने वालों में एकता कायम की जा सकती है। अलग अलग साम्प्रदायिक विचारों को सम्मान एवं समर्थन देकर नहीं। व्यर्थ के कुलाभिमान, ऊंच-नीच के भाव एवं बाह्य आचारों को धर्म समझना भ्रम नहीं अपराध है। कबीर के लिए प्रेम ही साधना है, व्रत या मुर्हरम नहीं, पूजा या नमाज नहीं, हज या तीर्थ भी नहीं। कबीर में साहस भी था और तर्क भी।

कबीर उलझाने में नहीं...

कबीर उलझाने में नहीं सुलझाने में विश्वास रखते थे। धर्म के चौराहें पर खड़ा होकर उन्होंने सबको खरी-खोटी सुनाई। वे संयोग और कुसंस्कारों के दुर्गम व्यूह को भेदते रहें। उनमें बाहरी धर्माचारों का अस्वीकार करने का अपार साहस था। कबीर कहते हैं कि निर्धन और धनवान दोनों भाई-भाई है। उनमें जो भेद दिख पड़ता है वह मिथ्या है। यदि ईश्वर एक है तो उसके दरबार में भेद कैसा ? कबीर मूलतः एक धार्मिक पुरूष थे। उन्होंने जब सामाजिक कुरूतियों की या धार्मिक रूढि़यों पर चोट की है तब यह समझना चाहिए कि यह एक ईमानदार, निश्चल आदमी की छटपटाहट है जो बुराईयों को देखकर अनदेखा नहीं कर सकता।
 

मंदिर-मस्जिद महज धार्मिक दुकानें हैं...

मंदिर, मस्जिद कबीर की दृष्टि में महज धार्मिक दुकानें है, कबीर इसी ठगी के खिलाफ जुझारू लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिवारी कवि थे। धर्म के संयोंग को नंगा करने वाले अगुआ थे। कबीर आम जनता के दुख-दर्द के हिस्सेदार थे। उनके श्रोता थे निर्धन किसान, निर्धन कारीगर एवं सब दृष्टि से त्याज्य एवं अछूत जन। उनका संबंध न तो सत्ता से था और न समाज के उच्च वर्गों से और न राजतंत्र के किसी भी हिस्से से वे लगाव रखते थे। कबीर ने धर्म और समाज में कैंसर की तरह फैले कर्मकाण्डों आचारों का उपचार किया, वेद और कुरान के बल पर नहीं, अपनी सच्ची प्रेमपरक लोकानुभूतियों के बल पर ही। वे मानव निर्मित भेदभावों की निर्मम उपेक्षा करके मानव एकता के प्रयास में हमेशा संघर्ष करते रहे।

-लेखक, सुंदरपहाड़ी गोड्डा झारखण्ड में प्राचार्य हैं।
 
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