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काफी गहरी हैं जगजीत सिंह की गाई ग़ज़लों की ये पंक्तियां...

शरद मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  जगजीत सिंह की ग़ज़लों ने दिल के दर्द को कम करने में अपना असर दिखाया है। उनकी गाई कुछ ग़ज़लों की ये असरदार पंक्तियां आपका इश्क़ से परिचय अवश्य करा सकती हैं और आपके दिल का दर्द भी कम कर सकती हैं। काव्य चर्चा के इस सेक्शन में हम मिर्ज़ा ग़ालिब, अमीर मीनाई और निदा फ़ाज़ली की ग़ज़लों की असरदार पंक्तियां आपकी नज़र कर रहे हैं जिनको जगजीत सिंह ने अपने सुर दिए हैं।      
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक... 

मिर्ज़ा ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक 
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक 

दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग 
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक 

ख़ून-ए-जिगर होते तक... 

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब 
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक 

ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र 
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक 

तुम को ख़बर होते तक... 

हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन 
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक 

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की ता'लीम 
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होते तक 

रक़्स-ए-शरर होते तक... 

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल 
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होते तक 

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज 
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक 

 

वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता... 

निदा फ़ाज़ली

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता 
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता 

सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें 
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता 

उतर क्यूँ नहीं जाता... 

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में 
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता 

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा 
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता 

न चेहरा न बदन है...

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है 
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता 
 

आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता... 

अमीर मीनाई

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता 

हम से कर लिया पर्दा...

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता 

अब तो सोने दो... 

शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तो अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता 

अदू का ख़ौफ़ है इतना...

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंटों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 
 

'अमीर' और मैं कहूँ उन से... 

वो बेदर्दी से सर काटें 'अमीर' और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता 
5 वर्ष पहले
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