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आजादी...कविताओं से जानें क्या होता है बंटवारे का दर्द...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  15 अगस्त नजदीक है। आजादी की वर्षगांठ जब भी आती है, तो तिरंगे के स्वाभिमान की चर्चा के बीच बंटवारे का दर्द भी कहीं न कहीं उभर आता है। आजादी मिली, तो कुछ इधर आ गए, कुछ सरहद के उस पार चले गए। कई महिला लेखिकाओं ने बंटवारे की यादों को अपने-अपने ढंग से व्यक्त किया है। इस मौके पर प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कृष्णा सोबती की कलम से कुछ यादें।

आजादी एक पवित्र शब्द!
हम में से बहुतों ने, कभी कभी जरूर देखे होंगे-
खेत बंटते
मुंडेर बंटते

घर-आंगन बंटते
पुराने दरवाजे बंद होते
नए रास्ते बनते
चूल्हे अलग होते
 
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फिर कैसे एक साथ!

फिर अपने-अपने चूल्हे की आग पर
अपनी-अपनी हंडिया चढ़ते-
पर तब तक देखा नहीं था- किसी मुल्क को बंटते।
वह बंटा-

यह हम हैं
वह तुम हो
हम तुम नहीं हो-
तुम हम नहीं हो-

फिर कैसे एक साथ!
कैसे रहेंगे हम एक साथ।
नहीं, नहीं- बिल्कुल नहीं।
कतई नहीं।

सुनो, कान खोलकर सुनो

सदियों-सदियों पुराना यह सिलसिला अब टूटता है।
एक-दूसरे को सहन करने का माद्दा फूटता है।

सुनो, कान खोलकर सुनो
हम हम हैं
और तुम तुम हो।
हम इधर हैं

तुम उधर हो-
इधर उधर-
एक धरती के दो टुकड़े
और लाखों के काफिले
 

बन गईं नई सरहदें

इधर से उधर
उधर से इधर
बन गईं नई सरहदें-
नई सरकारें
और नए झंडे।

नए कौमी तराने।
जो जख्मी हुए
जो मरे वह गए-
आधे ऊपर और

आधे नीचे-
कौन भला था,
कौन गुनहगार था।

खुदा के बंदो मार-काट नहीं

अब यह किसी को मालूम नहीं। मालूम था, तो इतना कि हमी जिंदा हैं और धड़कते बदनोवाली कतार में खड़े हैं।

दोनों तरफ बचे-खुचे गुमसुम अदीबों की आंखें खोजती हैं-
कहां है वह मसीहा
इधर है कि उधर है
कलमें ताजी हो गई-

स्याही ढूंढने लगीं?
पकड़ो, पकड़ो इन आवाजों को पकड़ो-
यह वक्त दुबारा कैसे दोहराओगे।

इसके बाद भी कुछ बचा जो लिखा जा सके।
खुदा के बंदो मार-काट नहीं-
अब कुछ सोचो।
बिछड़ गई रूहों की दलाली मत करो।

 

आजादी एक पवित्र शब्द। एक पाक अहसास...

कौन!
कौन हो तुम!
मैं मैं हूं!
तुम तुम हो

हम हम हैं
हम!

आजादी एक पवित्र शब्द। एक पाक अहसास। हाड़-मांस का, हर नागरिक, हर देश का शहरी अपनी रुह-आत्मा में इस जज्बे को महसूस करता है। यह खून की तरह उसकी शिराओं और धमनियों में दिन-रात बहता है। बहता रहा है।

अपने को खबरदार करता है- इससे नजर मत चुराना। इसको नजर मत लगाना।
इसके जख्मी होते ही तू गुलाम हो जाएगा।

(‘मार्फत दिल्ली’ से) कृष्णा सोबती, प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार

महादेवी वर्मा-सिरमौर सा तुझको रचा था...

सिरमौर सा
तुझको रचा था
सिरमौर सा तुझको रचा था
विश्व में करतार ने,

आकृष्ट था सब को किया
तेरे, मधुर व्यवहार ने।
नव शिष्य तेरे मध्य भारत
नित्य आते थे चले,

जैसे सुमन की गंध से
अलिवृन्द आ-आकर मिले।
वह युग कहां अब खो गया
वे देव वे देवी नहीं,

ऐसी परीक्षा भाग्य ने
किस देश की ली थी कहीं।
जिस कुंज वन में कोकिला के
गान सुनते थे भले,

रव है उलूकों का वहां
क्या भाग्य हैं अपने जले।
अवतार प्रभु लेते रहे

जो ज्वाला नभ में बिजली है,

अवतार ले फिर आइए,
मस्तक देकर आज खरीदेंगे हम ज्वाला
मस्तक देकर आज खरीदेंगे हम ज्वाला!
जो ज्वाला नभ में बिजली है,

जिससे रवि-शशि ज्योति जली है,
तारों में बन जाती है,
शीतलतादायक उजियाला!
मस्तक ...

फूलों में जिसकी लाली है,
धरती में जो हरियाली है,
जिससे तप-तप कर सागर-जल
बनता श्याम घटाओं वाला!

बांटी थी अमृत की हाला!

मस्तक ...
कृष्ण जिसे वंशी में गाते,
राम धनुष-टंकार बनाते,
जिसे बुद्ध ने आंखों में भर
बांटी थी अमृत की हाला!

मस्तक ...

जब ज्वाला से प्राण तपेंगे,
तभी मुक्ति के स्वप्न ढलेंगे,
उसको छू कर मृत सांसें भी
होंगी चिनगारी की माला!

- महादेवी वर्मा, प्रख्यात कवयित्री

 
8 वर्ष पहले
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