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एक लोरी गीत: गर्भस्थ शिशु के लिए...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  प्रसिद्ध कवियित्री अनामिका मानवीय संवेदनाओं को उकेरने में अग्रणी हैं। महिलाओं और बच्चों की मनोदशा का वास्तविक चित्रण उनकी कई कविताओं में सरल रूप में मिलता है। उन्होंने गर्भस्थ शिशुओं की धड़कन को भी अपने काव्य के जरिए नापा है। उनका यह लोरी गीत आप पढ़ें और जीवन की शुरुआत को महसूस करिए।  

आधा अंधेरा है, आधा उजाला है
इस प्रसन्न बेला में
रह-रहकर उठती है
एक हरी मितली-सी,
रक्त के समंदर से लाना है अमृतकलश!
मेरी इन सांसों से
कांप-कांप उठते हैं जंगल,
दो-दो दिल धड़क रहे हैं मुझमें
चार-चार होंठों से पी रही हूं मैं समंदर!
चूस रही हूं एक मीठी बसंती बयार
चार-चार होंठों से!
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एक तरफ मैंने उन्हें!

चार-चार आंखों से कर रही हूं आंखें चार मैं
महाकाल से!
थरथरा उठे हैं मेरे आवेग से सब परबत
ठेल दिया है अपने पैरों से
एक तरफ मैंने उन्हें!
यह प्रसव-बेला है, सोना मत,
इंद्रधनुष के सात रंगों से
है यह बिछौना सौना-मौना।
जनम रहा है जैसे मेरे पातालों से
एक नया आसमान!
अभी सोना मत!
बस, बेटी बस, थोड़ी देर सबर!
फिर मैं निंदिया के महाजल में
डुबकियां लगा दूंगी तुझको खुद,
दुधुवा पिला के सुला दूंगी तुझको खुद!

अंजुरी-भर तेल!

जनमतुआ चानी पर छपकूंगी
अंजुरी-भर तेल!
गुजुर-गुजुर आंखों में आंजूंगी
दुनिया के सारे अंधेरे!
लोरी गाएंगी दिशाएं तब-
‘आरे आव, पारे आव
नदिया किनारे आव,
सोने के कटोरिया में
दूध-भात ले ले आव।
बबुआ के मुंहवा में घुटूक!’
8 वर्ष पहले
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