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'ज़हनी हालातों' पर शायरों के अल्फ़ाज़

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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ज़िंदगी में जैसी स्थितियां आयीं उन्हें शायरों ने अपने अल्फ़ाज़ में ढाल दिया। शायरों के दिल बेहद कोमल होते हैं इसलिए वे हालात को बहुत गहराई से महसूस कर पाते हैं। उन्होंने जितना महसूस किया उतनी ही साफ़गोई से उसे कह भी दिया। पेश हैं शायरों के 'ज़हनी हालातों' पर लिखे शेर 

मिरे हालात को बस यूँ समझ लो
परिंदे पर शजर रक्खा हुआ है
- शुजा ख़ावर


अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को
तो जान लो कि यहाँ आदमी की ख़ैर नहीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी

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आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती
- अकबर इलाहाबादी


काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ
- शकील बदायूंनी

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं
- जिगर मुरादाबादी


हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल
उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती
- वसीम बरेलवी

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गई
- फ़िराक़ गोरखपुरी


वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे
- परवीन शाकिर

हर नए हादसे पे हैरानी
पहले होती थी अब नहीं होती
- बाक़ी सिद्दीक़ी


हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ
शीशे के महल बना रहा हूँ
- क़तील शिफ़ाई

6 वर्ष पहले
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