विज्ञापन

राष्ट्रकवि की राष्ट्रपिता के लिए सटीक कविता...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ

"जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ ।


 
विज्ञापन

पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो ।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो !"

सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस आंधी का था, जिसने हमें जन्म दिया था ।

तब भी हम ने गाँधी के
तूफ़ान को ही देखा,
गाँधी को नहीं ।

वे तूफ़ान और गर्जन के
पीछे बसते थे ।

सच तो यह है
कि अपनी लीला में
तूफ़ान और गर्जन को
शामिल होते देख
वे हँसते थे ।

तूफ़ान मोटी नहीं,
महीन आवाज़ से उठता है ।

वह आवाज़
जो मोम के दीप के समान
एकान्त में जलती है,
और बाज नहीं,
कबूतर के चाल से चलती है ।

गाँधी तूफ़ान के पिता
और बाजों के भी बाज थे 
क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।

~रामधारी सिंह दिनकर 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7450 कविताएं

View Profile