हर इंसान को अपनी 'मंजिल' की तलाश है, मंजिल की जूस्तुजू के चलते ही वह अपना जीवन सफर में झोंक देता है। लेकिन कोई मंजिल आखिरी नहीं, मंजिलें जहां ख़त्म होंगी, वहां जीवन थम सा जाता है। और जीवन रुकने का नाम नहीं है, चलने का नाम है। पेश है 'मंजिल' पर शायरों के अल्फ़ाज़-
जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
- बशीर बद्र
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रास्ते कहां ख़त्म होते हैं ज़िंदग़ी के सफ़र में,
मंज़िल तो वहां है जहां ख्वाहिशें थम जाएं।
-अज्ञात
अदम की जो हक़ीक़त है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से
मुसाफ़िर को तो मंज़िल का पता मंज़िल से मिलता है
- दाग़ देहलवी
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
- अहमद फ़राज़
मोहब्बत आप ही मंज़िल है अपनी
न जाने हुस्न क्यूं इतरा रहा है
- मज़हर इमाम
उस की और मंज़िल है मेरी और मंज़िल है
शैख़ से 'फ़िगार' अपना रास्ता नहीं मिलता
-फ़िगार उन्नावी
फ़ासले ही फ़ासले थे मंज़िलें ही मंज़िलें
हम-सफ़र कोई न था और रहनुमा कोई न था
-अज्ञात
हर फ़िक्र की अपनी मंज़िल थी
हर सोच का अपना रस्ता था
- ज़ेहरा निगाह
मुश्किलें जरूर है, मगर ठहरा नही हूं मैं
मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंचा नही हूं मैं
-अज्ञात
आग ही रोज़ डराती रही मंज़िल से मगर
हौसला पांव की ज़ंजीर में रक्खा गया था
- तसनीम आबिदी
अजब मुसाफ़िर हूँ मैं मेरा सफ़र अजीब
मेरी मंज़िल और है मेरा रस्ता और
- राजेश रेड्डी