विज्ञापन

कानों में बजता हुआ चुम्बन हूँ, उँगलियों की आँच हूँ : दूधनाथ सिंह

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  दूधनाथ जी लंबे रचनाकर्म के दौरान जितने सहज, सरल रहे, उतने ही मुखर भी। मुखरता इस हद तक कि कई बार अपनी बात रखते हुए उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कि उसका उनकी सेहत और संबंधों पर क्या असर होगा।

वह बतौर अध्यापक जहां अत्यंत लोकप्रिय रहे, वहीं पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी सफलतापूर्वक निर्वाह किया। साहित्य को जो कुछ दिया, उसके अतिरिक्त उनके सानिध्य में रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई।

उनकी तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित हैं। इनमें 'एक और भी आदमी है',  'अगली शताब्दी के नाम' और 'युवा खुशबू' है.  इसके अलावा उन्होंने एक लंबी कविता- 'सुरंग से लौटते हुए' भी लिखी है। आलोचना में उन्होंने 'निराला: आत्महंता आस्था', 'महादेवी', 'मुक्तिबोध: साहित्य में नई प्रवृत्तियां' जैसी रचनाएं दी हैं। नीचे उनकी 3 कविताएं हैं-

मैं तुम्हारी पीठ पर बैठा हुआ घाव हूँ
जो तुम्हें दिखेगा नहीं
मैं तुम्हारी कोमल कलाई पर उगी हुई धूप हूँ
अतिरिक्त उजाला –- ज़रूरत नहीं जिसकी
मैं तुम्हारी ठोढ़ी के बिल्कुल पास
चुपचाप सोया हुआ भरम हूँ साँवला
मर्म हूँ दर्पण में अमूर्त हुआ
विज्ञापन

उपरला होंठ हूँ खुलता हँसी की पंखुरियों में
एक बरबस झाँकते मोती के दर्शन कराता
कानों में बजता हुआ चुम्बन हूँ
उँगलियों की आँच हूँ
लपट हूँ तुम्हारी
वज्रासन तुम्हारा हूँ पृथ्वी पर
तपता झनझनाता क्षतिग्रस्त
मातृत्व हूँ तुम्हारा
हिचकोले लेती हँसी हूँ तुम्हारी
पर्दा हूँ बँधा हुआ
हुक् हूँ पीठ पर
दुख हूँ सधा हुआ
अमृत-घट रहट हूँ
बाहर उलीच रहा सारा
सुख हूँ तुम्हारा
गौरव हूँ रौरव हूँ
करुण-कठिन दिनों का
गर्भ हूँ गिरा हुआ
देवता-दैत्य हूँ नाशवान
मर्त्य असंसारी धुन हूँ
अनसुनी । नींद हूँ
तुम्हारी
ओ, नारी !

एक आँख वाला इतिहास

मैंने उस हाथ की आत्मा देखी--
साँवली और कोमल
और कथा-कहानियों से भरपूर !

मैंने पत्थरों में खिंचा
सन्नाटा देखा ।
जिसे संस्कृति कहते हैं ।

मैंने एक आँख वाला
इतिहास देखा
जिसे फ़िलहाल सत्य कहते हैं ।

अब राते हैं, अब घाते हैं 

अब राते हैं 
अब घाते हैं 

नगर-नगर फिरता हूं 
दृश्य निकले गोल-गोल 
जो आते हैं 
फिर जाते हैं। 

कठिन उजाला 
हृदय बीच जो कुम्भ 
छलक रहा है 
व्याकुल आने को बाहर 
नहीं चाहता कोई जाने
जीवन का यह अंत।

वन की पगडंडी के बीच 
छाया घेर रही है 
माया, छूटना कठिन 
यही बाते हैं। 

कभी जाने के लिए 
बस अभी आओ। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

sushil pandey

25 कविताएं

View Profile