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मौत पर ये हैं 18 बड़े शेर... 

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  जिंदगी और मौत के बीच हर कोई फासला चाहता है। लेकिन इसके बाद भी हर किसी को एक न एक दिन मौत आनी है। जिंदगी का एकमात्र सच मौत है। यह तीखा है, कड़वा है। पर यह जिंदगी के हसीन ख्वाब को जमीनी धरातल पर उतारता है। हम अपने पाठकों के लिए इसी मौत पर 18 बड़े शेर पेश कर रहे हैं। 

माँगी थी एक बार दुआ हम ने मौत की
शर्मिंदा आज तक हैं मियाँ ज़िंदगी से हम
-अज्ञात


कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा
-अहमद नदीम क़ासमी

 
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बला की चमक उस के चेहरे पे थी
मुझे क्या ख़बर थी कि मर जाएगा
-अहमद मुश्ताक़


अजल तो मुफ्त में बदनाम है जमाने में 
कुछ उनसे पूछ, जिन्हें जिंदगी ने मारा है
-फैज अहमद फैज 


अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे 
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे 
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़   


ज़िंदगी इक हादसा है और कैसा हादसा
मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं
-जिगर मुरादाबादी

 

जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं
ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से
-नज़ीर सिद्दीक़ी  


मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
         दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
         ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको
-गुलजार 

 

स्वाभाविक मौत भी, देखिए 
आती है बड़ी मुश्किल से

खण्डहर की उम्र
जीते हैं, तमाम बुरे लोग 
जिसके ढहने का अन्दाज़ा
नहीं होता अच्छे लोगों को

अच्छे-बुरे के बीच
ज़िन्दगी-मौत की तरह
चलता है, चूहे-बिल्ली का खेल

अच्छाई और ज़िन्दगी
दोनों, हैं तभी तक सुरक्षित
जब तक हैं बिलों में

बाहर आते ही, चूहे की मौत
मारी जाती है ज़िन्दगी

ऐसे अस्वाभाविक समय में
उसे अपने लिये, स्वाभाविक मौत चाहिए थी ।

-नील कमल

 

मृत्यु 
चली गई 
पुरानी चप्पलें 
पहनकर

मैं एक बार 
फिर लौट आई
अपने आप से 
कोई समझौता करने
-अनीता वर्मा 

 

अब एक हो गया है
बूँदों में बिखरा हुआ भारत

बल का सागर
अब प्रबल हो गया है

खुल गई हैं तहें
खुलती जा रही हैं राहें
एक-के-बाद एक;
जय का ज्वार
आ गया है पानी में

मौत की आ गई है मौत
जीवन का साथ दे रहा है शौर्य
जीता जीवन
हारी मौत

-केदारनाथ अग्रवाल 

मौत, जब दूर रहती है
पैदा करती है ख़ौफ़

मौत के नज़दीक आकर
सबसे बेख़ौफ़ होता है आदमी

मरते हुए आदमी के
साहस के आगे
झुकते हैं दुनिया के 
बड़े-बड़े दुःख

साधो, भय को देखना हो
नतमस्तक, करबद्ध, तो देखो
उस आदमी की आँखों में
जिसे मालूम है,
ज़िन्दगी की उलटी गिनती ।

-नील  कमल 

ज़िंदगी से तो ख़ैर शिकवा था
मुद्दतों मौत ने भी तरसाया
-नरेश कुमार शाद

मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई
निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया

बाज़ारे-मग़रिबी की हवा से ख़ुदा बचाए
मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया
-अकबर इलाहाबादी 

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
-मिर्ज़ा ग़ालिब

चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का
हवा के पास कोई मस्लहत नहीं होती
-वसीम बरेलवी

 
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