कवि जगन्नाथदास रत्नाकर ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं, वह पहले ज़की उपमान से फ़ारसी में रचना किया करते थे। रत्नाकर संस्कृत, फ़ारसी, उर्दू और ब्रजभाषा के भी ज्ञाता थे। उन्होंने ब्रजभाषा में अपनी उत्कृष्ट रचनाएं की हैं।
हरैं-हरैं ज्ञान के गुमान घटि जानि लगे,
जोग के विधान ध्यान हूँ तैं टरिबै लगे ।
नैननि मैं नीर सकल शरीर छयौ,
प्रेम-अदभुत-सुख सूक्ति परिबै लगे ॥
गोकुल के गाँव की गली में पग पारत ही,
भूमि कैं प्रभाव भाव औरै भरिबै लगे ।
ज्ञान मारतंड के सुखाये मनु मानस कौं,
सरस सुहाये घनश्याम करिबै लगे
(यह पद रत्नाकर के उद्धव शतक से है जिसमें उद्धव को श्रीकृष्ण द्वारा मथुरा भेजा जाता है ताकि वह गोपियों को ज्ञान का संदेश देकर उनकी विरह वेदना को कम कर सकें। उक्त पद तब का है जब उद्दव मथुरा से ब्रज की ओर जा रहे हैं औऱ सोच रहे हैं कि उनका ज्ञान का गुमान कैसा है औऱ वह योग का ध्यान करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उद्धव की आंखों में पानी है और जैेसे-जैसे उनका रथ आगे बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही उन्हें अद्भुत प्रेम की अनुभूति भी हो रही है। जैसे ही वह गोकुल की गांव की गली में पैर रखते हैं वैसे ही उन पर वहां की भूमि का प्रभाव और भी पड़ने लगता है।)
साभार- कविताकोश