रंगों का इस दुनिया को ख़ूबसूरत बनाने में एक बहुत बड़ा हिस्सा है। रंग ताजगी का एहसास करवाते हैं और हर चीज़ की अपनी एक पहचान बनाने में मदद करते हैं। जब चीज़ों को रंग मिले को भावनाओं को भी रंगों के नाम मिल गए जैसे हया का रंग हुआ लाल। उसी तरह इन्हीं रंगों को लेकर शायरो ने भी अपने अल्फ़ाज़ लिखे हैं।
सुर्ख़ - लाल
बलवाइयों ने रंग जमाया था हर तरफ़
धरती थी सुर्ख़ सुर्ख़ और अम्बर लहू लहू
- बुलंद इक़बा
पी बादा-ए-अहमर तो ये कहने लगा गुल-रू
मैं सुर्ख़ हूँ तुम सुर्ख़ ज़मीं सुर्ख़ ज़माँ सुर्ख़
- परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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हमें तो याद बहुत आया मौसम-ए-गुल में
वो सुर्ख़ फूल सा चेहरा खिला हुआ अब के
- मरग़ूब अली
बेहतर है अब दूर रहो तुम टेसू के इन फूलों से
शोख़ बहुत है इन की सुर्ख़ी आईना दिखलाए तो
- रौनक़ नईम
सब्ज़ मौसम से मुझे क्या लेना
शाख़ से अपनी जुदा हूँ बाबा
- क़ैशर शमीम
बाम-ओ-दर पर उतरने वाली धूप
सब्ज़ रंग-ए-मलाल रखती है
- आसिमा ताहिर
अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है
- गुलज़ार
बस अंधेरे ने रंग बदला है
दिन नहीं है सफ़ेद रात है ये
- अंजुम सलीमी
बाल हैं बिखरे बैंड हैं टूटे कान में टेढ़ा बाला है
'जुरअत' हम पहचान गए हैं दाल में काला काला है
- जुरअत क़लंदर बख़्श