मुंबई/गुलज़ार
रात जब मुंबई की सड़कों पर
अपने पंजों को पेट में लेकर
काली बिल्ली की तरह सोती है
अपनी पलकें नहीं गिराती कभी,--
साँस की लंबी लंबी बौछारें
उड़ती रहती हैं खुश्क साहिल पर!
मुंबई/ सुधीर सक्सेना
एक शहर
बिला नागा रोज
इंतज़ार करता है
लोकल का
एक शहर
लगभग दौड़ता हुआ
चढ़ता है लोकल में
एक शहर
भागता हुआ सा
उतरता है लोकल से
एक शहर आख़िरकार
समा जाता है
पहियों पर सवार एक बड़े शहर में।
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इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है
जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाँव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से
कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है
जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्थंभ के
जो नहीं है उसे थामें है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्थंभ
आग के स्थंभ
और पानी के स्थंभ
धुऍं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्थंभ
किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर
मैंने इस शहर को पहली बार
पानी के आईने में देखा
रेत के बीच
पिघलते हुए लोहे की तरह !
जैसे कुछ लोग बहुत दूर से
किसी ऊँची ढलान से
एक गहरी खाई में दस्तक दे रहें हैं !
एक पाँव पर खड़े होकर
सूर्य की पहली किरण के साथ
अर्घ का लोटा उठाये हुए
पूरी सभ्यता का भार
एक पैर पर लिए, निचोड़कर सूर्य का सारा ताप
मुझे विसर्जित कर दिया इस शहर की
ढलान से तंग गलियों के बीच !
आखिर मैं दंग हूँ
इस गहरी खाई में जहाँ इतने दरबे हैं,
जिसके मुख पर मकड़ियों ने जले बुन रखें हैं ,
हर तिराहे चोराहे पर लाल बत्ती लगा दी गई है!
जिसके जलते ही हम दुबक जाते हैं
चालीस चोरों की तरह !
हमने अपनी हर साँस रोजगार के रिक्क्त स्थानों में भरकर
लिफ़ाफ़े को चिपका दिया है !
उसके ऊपर गाँधी छाप डाक टिकट चिपका दिया है !
हमने अपने हर सपने हर जज्बात को
किताब के हर पन्ने पर अंडरलाइन कर दिया है !
लेकिन उसके भी
धीरे-धीरे पिला पड़ने ,सड़ने के अतिरिक्क्त
और कोई विकल्प सुरक्षित नहीं है !
लेकिन हमारे सपनो की नींव जहाँ पर है
वहीँ पर इतिहास का पहला प्रतिरोध दर्ज है !
लेकिन जब-जब इस दरबे से बाहर निकलने की कोशिश करता हूँ
और सोचता हूँ कि
ये खाई में पड़े हुए लोग
मेरे साथ खड़े होंगे
लेकिन तभी बजता है एक शंख
मंदिर का घड़ियाल
और लोग लेकर खड़े हो जातें हैं
लेकर मेरी अस्थियों का कलस !
शंख और घड़ियाल के बीच
मैं देखता रह जाता हूँ
दरबों में आत्म्हत्त्याओं का सिलसिला
मैं बैठ जाता हूँ और गौर करता हूँ
कि दरअसल,
जिस संस्कृति कि भट्ठी तुम
प्रयाग और कांची में बैठकर सुलगा रहे हो
उसकी आग कहीं और से नहीं
बल्कि मेरे घर के चुलल्हे से मिल रही है !
दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण से भीगी, दिल्ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है,
प्रेमिका-कंठ में पड़ी मालती की माला, दिल्ली सपनों की सेज मधुर रस-भीनी है।
बस, जिधर उठाओ दृष्टि, उधर रेशम केवल, रेशम पर से क्षण भर को आंख न हटती है,
सच कहा एक भाई ने, दिल्ली में तन पर रेशम से रुखड़ी चीज न कोई सटती है।
हो भी क्यों नहीं? कि दिल्ली के भीतर जाने, युग से कितनी सिदि्धयां समायी हैं।
औ` सबका पहुंचा काल तभी जब से उन की आंखें रेशम पर बहुत अधिक ललचायी हैं।
रेशम से कोमल तार, क्लांतियों के धागे, हैं बंधे उन्हीं से अंग यहां आजादी के,
दिल्ली वाले गा रहे बैठ निश्चिंत मगन रेशमी महल में गीत खुरदुरी खादी के।
वेतनभोगिनी, विलासमयी यह देवपुरी, ऊंघती कल्पनाओं से जिस का नाता है,
जिसको इसकी चिन्ता का भी अवकाश नहीं, खाते हैं जो वह अन्न कौन उपजाता है।
उद्यानों का यह नगर कहीं भी जा देखो, इसमें कुम्हार का चाक न कोई चलता है,
मजदूर मिलें पर, मिलता कहीं किसान नहीं, फूलते फूल, पर, मक्का कहीं न फलता है।
क्या ताना है मोहक वितान मायापुर का, बस, फूल-फूल, रेशम-रेशम फैलाया है,
लगता है, कोई स्वर्ग खमंडल से उड़कर, मदिरा में माता हुआ भूमि पर आया है।
ये, जो फूलों के चीरों में चमचमा रहीं, मधुमुखी इन्द्रजाया की सहचरियां होंगी,
ये, जो यौवन की धूम मचाये फिरती हैं, भूतल पर भटकी हुई इन्द्रपरियां होंगी।
उभरे गुलाब से घटकर कोई फूल नहीं, नीचे कोई सौंदर्य न कसी जवानी से,
दिल्ली की सुषमाओं का कौन बखान करे? कम नहीं कड़ी कोई भी स्वप्न कहानी से।
गंदगी, गरीबी, मैलेपन को दूर रखो, शुद्धोदन के पहरेवाले चिल्लाते हैं,
है कपिलवस्तु पर फूलों का शृंगार पड़ा, रथ-समारूढ़ सिद्धार्थ घूमने जाते हैं।
सिद्धार्थ देख रम्यता रोज ही फिर आते, मन में कुत्सा का भाव नहीं, पर, जगता है,
समझाये उनको कौन, नहीं भारत वैसा दिल्ली के दर्पण में जैसा वह लगता है।
भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में।
दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में।
रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखनेवालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में, तुम भी क्या घर भर पेट बांधकर सोये हो?
असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में, कया जल मे बह जाते देखा है?
क्या खाएंगे? यह सोच निराशा से पागल, बेचारों को नीरव रह जाते देखा है?
देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को, जिन की आभा पर धूल अभी तक छायी है?
रेशमी देह पर जिन अभागिनों की अब तक रेशम क्या? साड़ी सही नहीं चढ़ पायी है।
पर तुम नगरों के लाल, अमीरों के पुतले, क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे?
जलता हो सारा देश, किन्तु, होकर अधीर तुम दौड़-दौड़कर क्यों यह आग बुझाओगे?
चिन्ता हो भी क्यों तुम्हें, गांव के जलने से, दिल्ली में तो रोटियां नहीं कम होती हैं।
धुलता न अश्रु-बुंदों से आंखों से काजल, गालों पर की धूलियां नहीं नम होती हैं।
जलते हैं तो ये गांव देश के जला करें, आराम नयी दिल्ली अपना कब छोड़ेगी?
या रक्खेगी मरघट में भी रेशमी महल, या आंधी की खाकर चपेट सब छोड़ेगी।
चल रहे ग्राम-कुंजों में पछिया के झकोर, दिल्ली, लेकिन, ले रही लहर पुरवाई में।
है विकल देश सारा अभाव के तापों से, दिल्ली सुख से सोयी है नरम रजाई में।
क्या कुटिल व्यंग्य! दीनता वेदना से अधीर, आशा से जिनका नाम रात-दिन जपती है,
दिल्ली के वे देवता रोज कहते जाते, `कुछ और धरो धीरज, किस्मत अब छपती है।´
किस्मतें रोज छप रहीं, मगर जलधार कहां? प्यासी हरियाली सूख रही है खेतों में,
निर्धन का धन पी रहे लोभ के प्रेत छिपे, पानी विलीन होता जाता है रेतों में।
हिल रहा देश कुत्सा के जिन आघातों से, वे नाद तुम्हें ही नहीं सुनाई पड़ते हैं?
निर्माणों के प्रहरियों! तुम्हें ही चोरों के काले चेहरे क्या नहीं दिखाई पड़ते हैं?
तो होश करो, दिल्ली के देवो, होश करो, सब दिन तो यह मोहिनी न चलनेवाली है,
होती जाती है गर्म दिशाओं की सांसें, मिट्टी फिर कोई आग उगलनेवाली है।
हों रहीं खड़ी सेनाएं फिर काली-काली मेंघों-से उभरे हुए नये गजराजों की,
फिर नये गरुड़ उड़ने को पांखें तोल रहे, फिर झपट झेलनी होगी नूतन बाजों की।
वृद्धता भले बंध रहे रेशमी धागों से, साबित इनको, पर, नहीं जवानी छोड़ेगी,
सिके आगे झुक गये सिद्धियों के स्वामी, उस जादू को कुछ नयी आंधियां तोड़ेंगी।
ऐसा टूटेगा मोह, एक दिन के भीतर, इस राग-रंग की पूरी बर्बादी होगी,
जब तक न देश के घर-घर में रेशम होगा, तब तक दिल्ली के भी तन पर खादी होगी।
एक घनी हरियाली का सा सागर
उमड़ पड़ा है केरल की धरती पर
तरु पातों में खोए से हैं निर्झर
सुन पड़ता है केवल उनका मृदु स्वर
इस सागर पर उतरा वर्षा का दल
पर्वत शिखरों पर अँधियारे बादल
हरियाली से घनी नीलिमा मिलकर
सिन्धु राग-सी छाई है केरल पर
घनी घूम की गुंजें शिखर शिखर पर
झूम रहा हो मानो उन्मद कुंज
ऐसे ही होंगे दुर्गम कदलीवन
कविता में पढ़ते हैं जिनका वर्णन
सीमा तज कर एक हो गए सरि सर
बाँहें फैलाए आता है सागर
कल्पवृक्ष हैं यहीं, यहीं नंदन वन
नहीं किंतु सुर सुंदरियों का नर्तन
घनी जटाएँ कूट कूट कर बट कर
पेट पालते है ज्यों त्यों कर श्रमकर
यही वृक्ष है निर्धन जनता का धन
अर्धनग्न फिर भी नर नारी के तन
जिन हाथों ने काट काट कर पर्वत
यहाँ बनाया है दुर्गम वन में पथ
कब तक नंदन में श्रमफल से वंचित
औरों की संपदा करेंगे संचित
अर्ध मातृ सत्ताक व्यवस्था तज कर
नई शक्ति से जागे है नारी नर
लहराता है हरियाली का सागर
फिर सावन छाया है इस धरती पर
नदी गोमती
शहर लखनऊ
हम बाशिंदे उसी शहर के
बीच-शहर की तंग गली में
पुश्तैनी अपना मकान है
पहले ठाकुरद्वारा थी वह
बनी सामने जो दुकान है
याद हमें आते दिन
रह-रह
ठेठ गरमियों की दुपहर के
महफ़िल जमती थी घर में ही
दादी थीं शौक़ीन ताश की
उनसे ही थी सुनी कहानी
हनूमान के बराह्मपाश की
कई बार
उनकी गोदी में
दुबके थे राक्षस के डर से
आंगन में था पेड़ आम का
कटवा दिया भाई ने परसों
पता नहीं कितने ही पंछी
वहीं रहे थे बरसों-बरसों
कितने ही थे
मौसम दिल के
रातों की मीठी जगहर के
रखता है गो क़दीम1 से बुनियाद आगरा।
अकबर के नाम से हुआ आबाद आगरा॥
यां के खण्डहर, न और जगह की इमारतें।
यारो अ़जब मुक़ाम है दिल शाद2 आगरा॥
शद्दाद3 ज़र लगा न बनाता बहिश्त को।
गर जानता कि होवेगा आबाद आगरा॥
तोड़े कोई क़िले को कोई लूटे शहर को।
अब किस से अपनी मांगे भला दाद आगरा॥
अब तो ज़रा सा गांव है, बेटी न दें इसे।
लगता था वर्ना चीन का दामाद आगरा॥
एक बारगी तो अब मुझे यारब तू फिर बसा।
करता है अब खु़दा से यह फ़र्याद4 आगरा॥
एक खू़़बरू5 नहीं है यहां वर्ना एक दिन।
था रश्के हुस्न बलख़ो नौशाद आगरा6॥
हरगिज वतन की याद न आवे उसे कभी।
जो करके अपनी जां को करे शाद आगरा॥
इसमें सदा खु़शी से रहा है तेरा ”नज़ीर“।
यारब हमेशा रखियो तू आबाद आगरा॥
- आदि काल से
- प्रसन्नचित्त
- बहुत अधिक अत्याचार करने वाला एक प्राचीन बादशाह जो अपने को ईश्वर कहलवाता था, उसने दौलत लगाकर एक कृत्रिम स्वर्ग बनवाया
- सहायता के लिए पुकार
- रूपवान्
- आगरे पर बलख नगर भी जलन करता था
सुंदरता वह प्रतिभा है
जिसे रियाज़ की ज़रूरत नहीं
भोपाल ऐसी ही प्रतिभा से सम्पन्न और सिद्ध.
यह शहर कविताएँ लिखने के लिये पैदा हुआ
आप इसे पचमढ़ी का लाड़ला बेटा कह सकते हैं
पहाड़ यहाँ के आदिम नागरिक
झीलों ने आकर उनकी गृहस्थियाँ बसाई हैं.
यह शहर जितना पहाड़ों पर चढ़ा हुआ
उतना ही झीलों में तैर रहा
यह ऊँचाई और गहराई दोनों के प्रति आस्थावान
इस शहर में पानी की ख़दानें हैं
जिनमें तैर रहा है मछलियों का अक्षय खनिज भंडार.
इस शहर में जितनी मीनारें हैं,
उतने ही मंदिर भी,
लेकिन बागीचों की तादाद उन दोनों से ज़्यादा.
रात भर चलते मुशायरों और कव्वालियों के जलसों में
चाँद की तरह जागते इस शहर की नवाबी यादें
गुंबदों के उखड़ते पलस्तरों में से आज भी झाँकती हैं.
इस शहर का सबसे खूबसूरत वक़्त
शाम को झीलों के किनारे उतरता है
और यह शहर अपनी कमर के पट्टे ढीले कर
पहाड़ से पीठ टिका
अपने पाँव पानी में बहा देता है
और झील में दीये तैरने लगते हैं.
इसका पुरानापन हफ़्ते के वारों में सिमटा
साल के महीनों की तरह बारह नंबरों तक
इसका नयापन विस्तारित
रासायनिक त्रासदी का पोस्टर है ये शहर
इसने अपने गहरे शोक में ब्रश भिगोए
और रंग फैलाए
इसने जीवन की निरंतरता को सबसे बड़ी कला माना
यह आधा आन्दोलनों और हड़तालों में बीतता हुआ
और आधा मुआवज़ों के चक्कर में उलझा हुआ
यहाँ राजपथों और पगडंडियों के अपने-अपने अरण्य हैं
यह शहर लाल चट्टानों की असीम ख़दान है
बेशकीमती खनिजों सी लाल चट्टानों की
ख़ुदाई शुरू हो चुकी है
इस शहर की जड़ों पर हमले की
यह शुरूआत है
किसी भी शहर का दुर्भाग्य है महानगर होना
यह अब उसी कगार पर है
पहाडियाँ सिमट रही हैं, धीरे-धीरे
झीलें पानी में अपने विधवा होने
प्रतिबिंब देख डरती हैं
यह शहर ऐसी चिन्ताओं वाली कविताएँ
रोज लिख रहा है,
पढ़ रहा है
और
फाड़ रहा है........
साभार- कविताकोश