प्रसिद्ध शायर बेकल उत्साही ने हिन्दी उर्दू लफ़्ज़ों के मेल से एक ऐसी शायरी तामीर की जिसमें हिन्दुस्तान के गांवों में रहने वाले आम इंसानों के जज़्बात की तर्जुमानी और सदियों पुराने आपसी मेलजोल और भाईचारे की ख़ुशबू महकती थी। वे खुल्लम-खुल्ला कहते थे कि हिंदी और उर्दू में कोई फर्क़ नहीं है, ये दोनों ख़ुसरो की जुड़वां बेटियां हैं जिनमें से एक दाएं से चल रही है और दूसरी बाएं से -
धरम मेरा इस्लाम है, भारत जन्मस्थान
वुजू करूँ अजमेर में, काशी में स्नान
उन्होंने अपनी शायरी में, जिसमें ग़ज़ल, गीत और दोहे सभी शामिल हैं, नए- नए तजुर्बे भी किए। उन्होंने दोहे और छंद को तोड़-जोड़ कर गीतों को एक नया रूप दिया, जिसे वह ‘दोहिको’ कहते थे। शायरी की वह परंपरा जो अमीर खुसरो से शुरू होकर तुलसी, कबीर और नज़ीर से होती हुई उन तक पहुंची थी। उन्होंने उसे देश की सोंधी मिट्टी की ख़ुशबू से जोड़ा -
अब न गेहूं न धान बोते हैं,
अपनी किस्मत किसान बोते हैं,
गांव की खेतियां उजाड़ के हम,
शहर जाकर मकान बोते हैं।
ऐसे पड़ा नाम
1928 को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में पैदा हुए ‘मोहम्मद शफ़ी ख़ान’ वारिस अली शाह की दरगाह पर गए तो वहां अपने अंदर की ‘बेचैनी’ को पहचान कर ‘बेकल वारिस’ के नाम से शेर कहने लगे। 1952 में गोंडा के टामसन कालेज में पंडित जवाहर लाल नेहरू एक चुनावी सभा में आए हुए थे। उस जनसमूह में कुछ विपक्षी उम्मीदवार समर्थक शोर शराबा कर रहे थे। इस शोर शराबे के बीच भी एक नौजवान मंच से अपनी नज़्में और गीत सुनाकर वहां मौजूद भीड़ को अपने मोह में बांधे हुए था।
उस नौजवान कवि का उत्साह देखकर पंडित नेहरू ने उसे पास बुलाकर कहा, "तुमने जनता में उत्साह भर दिया, तुम तो वास्तव में उत्साही हो। "पंडित नेहरू ने उस नौजवान कवि को नया तख़ल्लुस दिया ‘उत्साही’। तब से ‘बेकल वारिस’ से ‘बेकल उत्साही’ बन गए।
हिंदू मुस्लिम एकता, हिंदी-उर्दू समरसता को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बनाने वाले बेकल उत्साही ने हिन्दुस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब और कबीर, मीर और नज़ीर की परंपरा को अपनी शायरी के ज़रिये एक ख़ास मिज़ाज दिया। बेकल उत्साही ने कभी अपने बारे में लिखा था -
सुना है मोमिन ओ ग़ालिब न मीर जैसा था
हमारे गांव का शायर 'नज़ीर' जैसा था,
छिड़ेगी दैर-ओ-हरम में यह बहस मेरे बाद
कहेंगे लोग की 'बेकल' कबीर जैसा था।
बेकल उत्साही उर्दू के नामवर शायर जिगर मुरादाबादी के शागिर्द भी थे और उनसे बेहद प्रभावित भी। यहां तक कि उन्होंने अपना हुलिया तक जिगर साहब की तरह बना रखा था। मुशायरों में तरन्नुम से लहक-लहक कर अपना कलाम सुनाते तो जिगर साहब की ही तरह समां बांध देते थे। पिछले पाँच दशकों से वे मुशायरों के मुमताज शायर रहे।
भारतीय संस्कृति में रची-बसी और विशेष रूप से अवध के आंचलिक परिवेश में ढली उनकी शायरी अपनी भाषा की सादगी के कारण भी आम भारतीय पाठकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती हुई, अपनी ओर आकर्षित करती है -
"बलम बम्बइया न जायो
दूनौ जने हियाँ करिबै मजूरी
घरबारी से रहियये न दूरी
हियैं पक्की बनइबै बखरिया,
बलम बम्बइया न जायो..."
उर्दू ग़ज़ल और हिंदी गीत की विशिष्टताओं को एक दूसरे में समो देने के कारण उनकी ग़ज़ल में या गीत में जो आंचलिकता और नयापन पैदा हुआ है, उससे बेशक उर्दू ग़ज़ल की परम्परागत दिशा में कुछ विचलन आया हो, लेकिन उर्दू शायरी को उनका ये योगदान ही है कि गाँव और लोकजीवन की दैनिक छवियाँ उर्दू शायरी में इस तरह पहले कभी नहीं देखी गयीं -
"फटी कमीज नुची आस्तीन कुछ तो है
ग़रीब शर्मो हया में हसीन कुछ तो है
लिबास क़ीमती रख कर भी शहर नंगा है
हमारे गाँव में मोटा महीन कुछ तो है"
साहित्य में उनके योगदान के लिए 1976 में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। बेकल उत्साही 1986 में राज्य सभा के सदस्य भी रहे। 3 दिसंबर 2016 को दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली। प्रख्यात समकालीन साहित्यकार अशोक चक्रधर ने बेकल उत्साही के बारे में लिखा है कि बेकल उत्साही हमारे देश की वाचिक परंपरा में गंगा-यमुना की मिली जुली संस्कृति के अकेले गायक थे। उनका रूप-सौंदर्य, उनकी वाणी का माधुर्य। दाढ़ी में गंगा जैसी बहती है सफेद नदी। उस नदी को कभी धूमिल नहीं होने दिया -
जब से हम तबाह हो गये
तुम जहाँपनाह हो गये
हुस्न पर निखार आ गया
आईने सियाह हो गये
आँधियों को कुछ पता नहीं
हम भी गर्द-ए-राह हो गये
दुश्मनों को चिट्ठियाँ लिखो
दोस्त ख़ैर-ख़्वाह हो गये
(लेखक महात्माध गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी अधिकारी व प्रकाशन प्रभारी हैं।)
5 वर्ष पहले