आंसू, इंसानी जज़्बातों का वो हिस्सा हैं, जो ग़म और ख़ुशी, दोनों ही स्थितियों गिरते हैं। कभी-कभी आंखें नम हो जाती हैं, कभी-कभी पनीली, शायर आंखों की भाषा आसानी से पढ़ लेता है। 'आंसू' जब शायर के हिस्से आता है और शायरी में ढलता है तब वह कैसा होता है, यह बताने के लिए हम पेश कर रहे हैं 'आंसू' पर कुछ चुनिंदा शेर-
आंखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमां ये घर में आएं तो चुभता नहीं धुआं
- गुलज़ार
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शायद तू कभी प्यासा मेरी तरफ़ लौट आए फ़राज़
आंखों में लिए फिरता हूं दरिया तेरी ख़ातिर
-अहमद फ़राज़
सिर्फ़ चेहरे की उदासी से भर आए आंसू फ़राज़
दिल का आलम तो अभी आपने देखा ही नहीं
-अहमद फ़राज़
बिछी थीं हर तरफ़ आंखें ही आंखें
कोई आंसू गिरा था याद होगा
- बशीर बद्र
फ़िर आज अश्क़ से आंखों में क्यूं हैं आए हुए
गुज़र गया है ज़माना तुझे भुलाए हुए
- फ़िराक गोरखपुरी
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आंसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे
- नज़ीर बाक़री
अब अपने चेहरे पर दो पत्थर से सजाए फिरता हूं
आंसू ले कर बेच दिया है आंखों की बीनाई को
- शहज़ाद अहमद
इन को नासिर न कभी आंख से गिरने देना
उनको लगते हैं मेरी आंख में प्यारे आंसू
- नासिर काज़मी
यह उड़ी उड़ी सी रंगत, यह खिले खिले से आंसू
तेरी सुबह कह रही है, तेरी रात का फ़साना
-दाग़ देहलवी
अश्कों के टपकने पर तस्दीक़ हुई उसकी
बेशक वो नहीं उठते आंखों से जो गिरते हैं
- नूह नारवी