अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- उदधि, जिसका अर्थ है- समुद्र, सागर, बादल, घड़ा। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़...
मैं हूं उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
कभी नहीं जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नहीं जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
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निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उद्गार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता
ऊँचे से ऊँचे सपनों को देते रहते जो न्यौता
दूर देखती जिनकी पैनी आंख, भविष्यत का तम चीर
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो अपने कन्धों से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
पथ की बाधाओं को जिनके पांव चुनौती देते हैं
जिनको बांध नहीं सकती है लोहे की बेड़ी जंजीर
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लूका धर कर
हर जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर
कूद #उदधि में नहीं पलट कर जो फिर ताका करते तीर
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जिनको यह अवकाश नहीं है, देखें कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह नहीं है कब तक भद्रा, कब दिक्शूल
जिनके हाथों की चाबुक से चलती है उनकी तकदीर
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही ग़लत पथ लो तो जान
सोच सोच कर, पूछ पूछ कर बोलो, कब चलता तूफ़ान
सत्पथ वह है, जिस पर अपनी छाती ताने जाते वीर
मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़